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जताने वाला डॉ. पी.जी. सोलंकी का पत्र भी पढ़ कर सुनाया गया। गायन मास्टर भीमाजी द्वारा प्रशिक्षित लड़के-लड़कियों द्वारा स्वागत पद गाया गया। श्री वि. का. उपशाम ने डॉ. पी. जी. सोलंकी के न आ पाने पर गहरा खेद प्रकट किया। उसके बाद उन्होंने डॉ. बाबासाहेब का मानपत्र पढ़ कर सुनाया। उसके बाद विधायक भाऊराव गायकवाड का भाषण हुआ। अपने भाषण में उन्होंने बताया कि डॉ. बाबासाहेब का काम सर्वश्रेष्ठ वर्णनातीत होने की बात योग्य शब्दों में बता कर स्वतंत्र लेबर पार्टी के संगठन पर जोर दिया। उसके बाद सड. तलपदे ने अपने भाषण में डॉक्टर साहब का गुणवर्णन किया। साथ ही काँग्रेस की पक्षपातपूर्ण कार्रवाइयों का वर्णन कर स्वतंत्र लेबर पार्टी को एसेंबली के कार्य के लिए धन्यवाद दिया। उनके बाद भाई चित्रे ने अपने भाषण में बताया कि किस प्रकार महाड के चवदार तालाब पर अस्पृश्यों के आत्मोद्धारक आंदोलन का बीज बोया गया और किस प्रकार आज वही आंदोलन अखिल किसान मजदूर वर्ग के लिए संघर्ष के सिद्धांत की बुनियाद पर स्वतंत्र लेबर पार्टी के रूप में कैसे संगठित हुई है और किस प्रकार जोरदार ढंग से चल रही है इसका सिलसिलेवार वर्णन कर बताया कि हमारे इस स्वतंत्रता संग्राम में कोई भी पाशवी ताकत हमारे विरोध में टिक नहीं सकेगी। अपने भाषण को पूरा करते हुए उन्होंने बताया कि अबके बाद हम अहिंसा की दिखाऊ लड़ाई लड़ते हुए मार नहीं खाएंगे, अब हम हमारे काम में अंडगे खड़े करने वाले हित शत्रुओं की जम कर पिटाई करेंगे। उसके बाद अध्यक्ष के हाथों श्री गजोबा दगडूजी दुधावडे ने डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को चांदी के कास्केट में मानपत्र और 101 रु. की थैली अर्पण की। उन्हें फूलमालाएं पहनाने, गुलदस्ते दिए जाने पर श्रोताओं ने तालियों की गड़गड़ाहट की और जयध्वनि से वातावरण भर दिया। श्रोताओं की और दर्शकों की ओर से डॉ. बाबासाहब का यह अलग तरह का गौरव था। उसके बाद अध्यक्ष की आज्ञा से डॉ. पी. जी. सोलंकी का मानपत्र भी विल डोलस ने पढ़ कर सुनाया। उसके बाद स्वयं अध्यक्ष ने अपने हाथों मेसर्स दुधावडे, बोरीकर, उपशाम, डोलस, करंदीकर और संस्था के सचिव श्री भवार आदि कार्यकर्त्ताओं के हाथ सौंप दी। उसके बाद डॉ. बाबासाहेब तालियों की गड़गड़ाहट के बीच बोलने के लिए उठ कर खड़े हुए। उन्होंने कहा-
भाइयों और बहनों,
आप मेरा भाषण सुनने के लिए आतुर हैं लेकिन आज मैं अधिक बोल नहीं पाऊंगा। क्योंकि सेहत ठीक कराने के लिए आज मैंने व्रत रखा है। शनिवार है इसलिए आज मेरा व्रत नहीं है। भगवान या धर्म में मेरा बिल्कुल विश्वास नहीं है। भगवान और धर्म की मूर्खताभरी कल्पनाओं के बारे में एक बार मैंने अपने हिंदु मित्रों को शंकर की पिंडी के बारे में जानकारी पूछी। वे बता नहीं पाए। क्या है शंकर की पिंडी। यहाँ मैं इसे ज़्यादा स्पष्ट नहीं कर पाऊंगा। संक्षेप में बताना हो तो वह केवल संभोग दृश्य है। धर्म के प्रति श्रृद्धालु लोग उसकी षोडषोपचार से पूजा करें। हमें उससे कुछ लेना-देना नहीं। पते की