125 4.4.1938 हम पहले और आखिर में भी केवल भारतीय हैं इस सोच को अपनाएं - मुंबई - Page 143

122 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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* हम पहले और आखिर में भी केवल भारतीय हैं इस सोच को अपनाएँ

सोमवार दिनांक 4 और मंगलवार दिनांक 5, अप्रैल, 1938 के दिन केवल गैर-सरकारी बिलों का काम होना था। आज कर्नाटक के विभाजन का प्रस्ताव एसेंब्ली के सामने आना था इसलिए स्पीकर की गैलरी में कर्नाटक के प्रसिद्ध नेता श्री गंगाधर राव देशपांडे आदि दिखाई दे रहे थे। दर्शक दीर्घा में भी कन्नड लोगों की ही भीड़ दिखाई दे रही थी। पहले कुछ सवाल-जवाबों के बाद श्री वी. एन. जोग ने अपना प्रस्ताव एसेंबली के सामने रखा।

श्री वी. एन. जोग द्वारा रखे गए प्रस्ताव के मूल प्रारूप में सैद्धांतिक तौर पर सुधार करने के बाद यह प्रस्ताव आगे दी जा रही उपसूचना के साथ एसेंबली में रखा गया जिन विभागों में मुख्य रूप से कन्नड भाषा बोली जाती है उन सबको साथ लाकर उनका एक स्वायत्त कर्नाटक प्रांत बनाने की जल्द से जल्द व्यवस्था की जाए। एसेंब्ली की यह राय मुंबई सरकार ब्रिटिश सरकार तक पहुँचाए। श्री जोग ने कर्नाटक के विभाजन की सहमति बताई उसके बाद एसेंब्ली के कन्नड सदस्य श्री दोडुसेटी, नलवडी, जकाती आदि के भाषण हुए। उनके बाद करंदीकर, कॉ. झालूवाला, एस. पी. पाटील के भाषण हुए। उसके बाद स्वतंत्र लेबर पार्टी के नेता डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का विरोधी भाषण हुआ। उन्होंने अपने भाषण में कहा,

इस प्रस्ताव में उठाया गया सवाल मेरी नजर में बेहद गंभीर है। भाव विवश होकर किया जाए ऐसा यह काम नहीं है। कर्नाटक के विभाजन का मामला आसानी से हल होने वाला मामला नहीं है। विभिन्न प्रांतों के होने के बावजूद हम अस्पृश्य बंधु कभी ऐसा भेद-भाव बिल्कुल नहीं करते कि ये गुजराती है, ये महाराष्ट्रीय है या कन्नड है आदि। भवनाओं से रहित होकर मैं इस मसले को देख रहा हूँ। मुंबई इलाके के संयुक्त परिवार में इन तीनों प्रांतों के लोग पिछले 115 सालों से भाईचारे के साथ रह रहे हैं। करीब 90 सालों तक सिंध प्रांत भी हमारे साथ था। आज उसका विभाजन हो चुका है। हालांकि आर्थिक मामलों में विभाजित सिंध का हाल कितना है इसके बारे में आपको जानकारी होगी ही। कर्नाटक के विभाजन का मुख्य कारण यही है कि कन्नड बोलने वालों का एक अलग प्रांत है। हालांकि उनका एकीकरण कहाँ तक सफल हो पाएगा इस बारे में जबरदस्त आशंका है। क्योंकि इस कर्नाटक का बड़ा हिस्सा रियासतों में है। रियासतों का कन्नड हिस्सा अगर कर्नाटक में शामिल करवा लेना हो तो उसके बदले में रियासतों को दूसरा हिस्सा देना पड़ेगा। ऐसे

* ख्., जनता, 9 अप्रैल, 1938