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में खालसा प्रांत के लोग इतने मुआवजे पर रियासत में शामिल होने पर कभी राजी नहीं होंगे। क्या आपने इस बारे में कभी सोचा है? इसी तरह, आज के हालात में कर्नाटक के साथ अन्याय हो रहा है कहने में क्या मतलब है? इस बारे में सूक्ष्मता से सोचने पर पता चलेगा कि नए संविधान के अनुसार इस प्रांत को क्या कम प्रतिनिधित्व मिला है? भाषा पर आधारित जनसंख्या पर ध्यान दें तो मराठी भाषा बोलने वालों की संख्या 98 लाख से अधिक गुजराती बोलने वालों की संख्या 34 लाख और कर्नाटक के 32 लाख है। और इस जनसंख्या के अनुपात में गुजरातियों को 27, कर्नाटकियों को 21 जगह मिलनी चाहिए। लेकिन प्रत्यक्ष रूप में विभाजन में गुजरात को 31 और कर्नाटक को 28 सीटें मिलने के कारण महाराष्ट्रीयनों के साथ अन्याय हुआ है। मैं प्रांतों में भेदभाव नहीं करना चाहता। लेकिन अब कर्नाटक प्रांत के विभाजन के कारण यह प्रत्यक्ष स्थिति उजागर करना जरूरी है। यही बात ऊंचे पदों के साथ भी है। इन पदों के विभाजन के दौरान का मराठी प्रतिनिधियों के साथ अन्याय हुआ है। मराठी प्रतिनिधियों का सैंकडा अनुपात 9.3 गुजरातियों का 3.6 और कर्नाटक का 3.1 है। लेकिन अधिकारियों के पदों का विभाजन मराठी-6, गुजरातियों का 6 और कर्नाटक का 4 इस प्रकार हुआ है। इससे साफ जाहिर होता है कि कर्नाटक के साथ अन्याय नहीं हुआ है। इन प्रांतों की आर्थिक स्थितियों के बारे में देखें तो उनकी आमदनी 205 करोड़ से अधिक का प्रावधान नहीं है। हमारी मुंबई की सालाना आमदनी 4 करोड़ रुपये होने के बावजूद इस शहर की जरूरतें पूरी नहीं होती। और आधुनिक तरीकों से प्रांत के प्रबंधन के लिए ढाई करोड़ में कर्नाटक क्या कर पाएगा?
हमेशा अकाल से पीडि़त, वस्त्र और अनाज के अभाव में लोगों का बुरा हाल देखने के बाद इतनी कम आमदनी में इस आजाद होने की चाह रखने वाले इस प्रांत का खर्चा कैसे चलेगा? बहुत हुआ तो जिन थोड़े लोगों के हाथों में अधिकार के सूत्र आएंगे, जिन्हें उनकी लालसा है, बस उन्हीं लोगों को थोड़ा-बहुत संतोष मिलेगा। इसीलिए, इस प्रांत के विभाजन के लिए में कभी मान्यता नहीं देना चाहता। बिजापुर और बेल्लारी जैसे अकाल पीडि़त जिले जब अपनी समस्याओं के साथ मुँह बाकर खड़े हों तब प्रांत के खर्चों का आप आमदनी के साथ कैसे मिलान करने वाले हैं? हमारे समाज के लिए इस प्रांत में केवल दो ही स्थान हैं। यहाँ की एसेंब्ली में हमारे अन्य प्रतिनिधियों के कारण उन्हें समर्थन तो प्राप्त है लेकिन विभाजन के कारण ऊंचे वर्ग के लोग उन्हें परेशान किए बगैर नहीं रहेंगे। कोई प्रांतभेद, यहाँ तक कि मैं खुद को महाराष्ट्रीय कहलाना भी पसंद नहीं करता। साथ ही प्रांत भेद, संस्कृति आदि भेदभावों का मैं कभी पालन नहीं करना चाहता। पहले हिंदी, फिर हिंदू या मुसलमान यह भी मुझे सही नहीं लगता। सबको यही रूख अपनाना चिहए कि पहले भारतीय, आखिर में भारतीय, और भारतीयता से परे कुछ नहीं चाहिए। भारतीय आजादी की लड़ाई के लिए यही मानसिकता सच्चे मायनों में पोषक है। इसी कारण मैं इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध करता हूँ।