126 20.4.1938 अपने पवित्र मत बेचें नहीं, उन्हें सत्कार्य में लगाएं - इस्लामपुर - Page 145

124 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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* अपने पवित्र मत बेचें नहीं, उसे सत्कार्य में लगाएँ

बुधवार दिनांक 20 अप्रैल, 1938 को इस्लामपुर और ओंड में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर की अध्यक्षता में दो बड़ी सार्वजनिक सभाएँ हुईं। विधायक सावंत, ससाने मास्तर, मे. उबाले इस बारे के दौरे में उनके साथ थे। इस्लामपुर की सभा की शुरूआत श्री डी. एस. पवार के भाषण से हुई। उनके बाद विधायक सावंत का भाषण हुआ। उन्होंने अपने भाषण में काँग्रेस और स्वतंत्र लेबर पार्टी के काम की तुलना बड़ी कुशलता के साथ की। उसके बाद काँग्रेस ने किस प्रकार ब्राह्मणतर सत्याशोधक समाज नष्ट किया यह बता कर इस मामले में सातारा के मराठा समाज को उनके कर्त्तव्य का अहसास कराया। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि इस बार जितना बोर्ड के चुनावों में अपनी पार्टी की ओर से इस्लामपुर तहसील के वालवा से श्री भाऊराव देवजी कांबले और तासगांव से श्री खंडनाक राजनाक इनामदार और खानापुर से श्री धोंडी मालू सालवे चुनावों में उतर रहे हैं। उन्हें ही अपना वोट दें। उनके भाषण के बाद डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर भाषण देने के लिए उठ कर खड़े हुए तब चारों तरफ से तालियों की आवाज गूंज उठी।

अपने भाषण में उन्होंने कहा,

अगले महीने, की 24 तारीख को इस जिले में जिला लोकल बोर्ड के चुनाव होने हैं। मैं यही बताने खड़ा हूँ कि इन चुनावों में पृथक मजदूर पार्टी की ओर से जो उम्मीदवार

खड़े हैं उन्हीं को अपना मत देकर चुनाव जिताएं। आज की सभा में मराठा और अस्पृश्यों का मिला-जुला जमावड़ा है। इसलिए मराठों को अलग से जो मैं बताना चाहता हूँ वह बताना संभव नहीं हो पाएगा। खैर इस देश के हिंदु समाज की रचना ही ऐसी है कि ब्राह्मणों की अन्य सभी ब्राह्मणेतर वर्गों पर वर्चास्विता रहेगी। यहाँ कोई धार्मिक विधियाँ ब्राह्मणों के बगैर की नहीं जा सकती। अन्य व्यवहार में भी उनके अलावा संभव नहीं। हाइकोर्ट के ऊंचे पद से लेकर गांव के पटवारी तक ब्राह्मणों के अलावा कोई दिखाई नहीं देगा। 1919 से 1938 तक कौंसिल में केवल चार-पाँच ब्राह्मण ही दिखाई दिया करते थे। लेकिन अब इन ब्राह्मण काउंसिलर्स की गिनती 27 तक पहुँची है। मेरी जानकारी के अनुसार एसेंबली 11 में से 6 अधिकार वाली जगहें ब्राह्मणों ने काबीज कर ली हैं। उसमें पादील की हैसियत क्या है? 175 सदस्यों में से कोई भी उन्हें नहीं पूछता। सच पूछो तो इस देश की राजनीति बिना ब्राह्मणों के ही चलनी चाहिए। लेकिन आज राजनीति

* ख्., जनता, 9 अप्रैल, 1938