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* दंगों पर नियंत्रण के लिए कड़े उपाय करना जरूरी
पिछले चार-पाँच दिनों से जिस पर खूब चर्चा हो रही है उस ना. मुंशी बिल पर जिसमें उन्होंने दंगों के दौरान मुंबई के गुंडों को पकड़ कर तड़ीपार करने का अधिकार पुलिस कमिशनर को देने की सिफारिश की है वह 26 अप्रैल, 1938 को एसेंब्ली में चर्चा होनी थी। ना. मुंशी के मूल सुधार बिल में पृथक मजदूर पार्टी के नेता डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर द्वारा सुलझाई गई उपसूचना खास महत्वपूर्ण थी। इस सूचना के कारण मत बिल का उद्देश्य निश्चित किया गया। डॉ. अम्बेडकर की सूचना का तथ्य इस प्रकार है-‘‘मुंबई शहर या शहर के किसी भी हिस्से में विभिन्न जातियों में अनबन पैदा होने के कारण अगर आपात स्थितियाँ पैदा हों तो सरकार गैजट के जरिए त्वरित घोषणापत्र जारी कर इस बिल में उर्द्धत अधिकार कमीशनर को बहाल करें। ये अधिकार केवल एक महीने के लिए ही वैध रहेंगे। एक महीने से अधिक समय तक इस कानून की जरूरत पड़े तो एक बार फिर घोषणा की जाए। साथ ही इस पुलिस कमीशनर के हुकम पर प्रांत की सरकार से अपील करने का अधिकार का भी प्रावधान रखा गया है।’’ इस सूचना के जरिए मुंबई शहर के नागरिकों के हकों की सुयोग्य तरीके से रक्षा की गई है।
27 अप्रैल, 1938 को एसेंबली में कुछ उपसूचनाओं के बाद डॉ. अम्बेडकर अपनी सूचना पर बोलने के लिए खड़े हुए। उन्होंने अपने भाषण में कहा,
जिन गुण्डों के मवालीपन के बारे में ना. मुंशी ने इस बिल को प्रस्तुत करते हुए टिप्पणी की उनके बारे में पुलिस कमीशनर या ना. मुंशी से अधिक जानकरी मुझे है। 1911 से 1933 तक मैं मुंबई इंप्रुवमेंट चॉल में रहता था सो मैं जानता हूँ कि गुंडे या मवालियों से गरीबों को कितनी भयंकर मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। साथ ही, जिन दंगों के बारे में इस कानून को लागू किया जाने वाला है उसके बारे में थोड़ा इतिहास यहाँ बताने में कोई हर्ज नहीं। 1851 से 1938 तक मुंबई में कुल 9 भयंकर जातीय दंगे हुए। इनमें से पहला दंगा 1851 में मुसलमान और पारसियों के बीच हुआ। दूसरा दंगा भी 1874 में मुसलमान और पारसियों के बीच ही हुआ। उसके बाद सन् 1893, 1929, 1932, 1933, 1936 और 1938 में दंगे हुए। ये सभी दंगे हिंदू और मुसलमानों के बीच हुए हैं। इन सभी क्षेत्रों में जख्मी लोगों के आंकड़े बताने के बाद में बाबासाहेब ने आगे कहा कि इन दंगों के पीछे की मानसिकता को देखा जाए तो उन
* ख्., 30 अप्रैल, 1938