134 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
ने जो उत्साह भरा भाषण दिया उससे अस्पृश्यों के मन में नई उमंग जाग गई।
पहले डॉ. बाबासाहेब ने उन्हें आने में एक दिन की देरी होने के बारे में बताते हुए खेद व्यक्त किया कि सबको एक दिन तक इंतजार करना पड़ा। उसके बाद उन्होंने कहा,
यहाँ मुझे अलग भाषण देना होगा। जिस दिन से मुंबई में अंग्रेजों ने कदम रखा उसी दिन से हमारे महार समाज को अपना नसीब चमकाने का मौका मिला। अंग्रेजों की हुकूमत के कारण हमारे अपना नसीब चमकाने का रास्ता साफ हुआ। अंग्रेज विदेश से आए। उनके पास सेना-सिपाही नहीं थे। सेना खड़ी किए बगैर राज्य मिलने की संभावना नहीं थी। पेशवाओं के राज्य में उच्च वर्णों को ही बड़पन्न और सुख-संपत्ति मिल पा रही थी। इस कारण उच्च वर्ण के लोग सेना में नहीं जाते थे। पेशवा युग में अस्पृश्य आदि पद दलित वर्ग के साथ बेहद क्रूरता भरा व्यवहार किया जाता था। उन्हें इंसान के तौर पर जीने की इजाजत ही नहीं थी। पराक्रमी और वीर होने के बावजूद दलित होने के कारण पेशवा युग में उनकी कोई पूछ नहीं थी। महार, मांग और चमारों के आगे अंग्रेजों की सेना में भर्ती होने के अलावा कोई और चारा नहीं था।
हिंदुस्तान में अंग्रेजों का राज महार, मांग, चमार आदि अस्पृश्य वर्ग के शूरवीर सैनिकों की मदद से बसा। कोरेगांव में बनी मीनार से इस बात का ऐतिहासिक साक्ष्य मिलता हे। वरना अंग्रेजों को इस देश का राज कभी नहीं मिलता। इसके परिणाम अच्छे हुए या बुरे यह आप सब लोग जानते हैं। पेशवा युग के बारे में बताते हैं कि तब महारों को सड़कों पर खुले आम घूमने की छूट नहीं थी। कोई महार सड़क पर थूकता है और किसी ब्राह्मण का पैर उस पर पड़ता है तो ब्राह्मण छुआछूत का शिकार होता है। उसे एक बार फिर नहाना पड़ता है। इसलिए महारों के गले में मटकी बांधा करते थे। महार की पहचान के लिए उसे अपने हाथ में काला आगा बांधना पड़ता था। कुत्ते-बिल्लियों से भी महारों को गया-गुजरा, मानते थे। लेकिन अंग्रेजों की सैनिक भरती के कारण महारों की स्थितियाँ बदलीं। उनके साथ अपनत्व का व्यवहार किया। अपने साथ भी लोग इंसानियत से पेश आ सकते है इसका उन्हें अनुभव हुआ। इस प्रकार अंग्रेजों के पहले कार्यकाल में सौ-सवा सौ सूबेदार, उससे कई गुना अधिक जमादार-हवलदार हुए। पुराने जमाने में गाँव का मराठा आदमी जिसके साये से बचा करता था वही सेना में दाखिल होने के बाद उसे अपने ही गाँव के महार सूबेदार को सलाम करना पड़ता था। अपना बड़पन्न बताने के लिया या गप्प हांकते हुए मैं यह सब आपको नहीं बता रहा। 1896 में अंग्रेजों ने महार लोगों की सेना में भरती बंद कर दी। इस कारण पदोन्नति पर रोक लगी। खुद कुलमाहा पीकर जिन अंग्रेजों को चावल पका कर खिलाया, जिनके लिए अपना खून बहाया उन्होंने ही हमारी उन्नति पर रोक क्यों लगा दी वह सवाल उठना स्वाभाविक है। लेकिन इसमें अंग्रेजों का कोई दोष नहीं, दोष है तो बस हमारा और तुम्हारा है। महार अत्यंत दलित