133 16.5.1938 जीवन में सर्वोच्च स्थान पाने की महत्वाकांक्षा पालिए - चिपलून (रत्नागिरी) - Page 162

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* जीवन में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करने की महत्वाकांक्षा पालिए

16 मई, 1938 को चिपलून में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का एक अत्यंत ओजस्वी भाषण हुआ। डॉ. साहेब के भाषण से पूर्व श्रीमती रत्नाबाई का भाषण हुआ। उसने कहा, ‘‘हम पर जमींदार बेहद जुल्म ढाते हैं और अब सब असहनीय होता जा रहा है। आप अब यहाँ सभा लेंगे और आगे खेड, दापोती चले जाएंगे। वहाँ से मुंबई लौटेंगे। हम जहाँ है वहीं रहने वाले हैं, हमेशा के लिए। आपके जाने के बाद भी हम पर होने वाले अत्याचार जारी रहेंगे। ऐसी स्थितियों में आप हमारे लिए क्या करने जा रहे हैं? इसके बावजूद मुझे डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के कार्य के बारे में आशा महसूस होती है।’’आदि उनके भाषण के बाद काँग्रेसियों ने कुत्साभाव से तालियाँ बजाईं।

जवाब में बाबासाहब ने कहा,

सचमुच यहाँ किसानों के साथ रह कर आपकी यथाशक्ति सेवा करना मुझे अच्छा लगता। मैं उसमें धन्यता महसूस करता। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि आप की ही तरह मुझे भी अपने व्यवसाय में ध्यान देना पड़ता है। उस व्यवसाय के बगैर मेरे पेट भरने का मसला हल नहीं होता। मेरे व्यवसाय का दर्जा बड़ा हो सकता है लेकिन मैं खुद भी बंधा हुआ हूँ। मेरा जन्म गरीब हालात में हुआ।, मुझ परपिताजी के लिए 3-4 हजार रुपयों का कर्जा था। बताने का उद्देश्य सिर्फ यही है कि मैं पैदाइशी अमीर नहीं हूँ। सो, अपनी इच्छा के विपरीत आप सभी को छोड़ कर अपने व्यवसाय की खातिर मुझे मुंबई जाना होगा।

अभी, रत्नाबाई के भाषण के बाद कुछ लोगों ने मजाक उड़ाने के उद्देश्य से तालियाँ बजाई। उनकी तालियों का मैं यही मतलब समझता हूँ कि उनको लगता है कि किसी ने हमारे दल के बारे में, अच्छा ही है कि बुरा-भला कहा। लेकिन मैं पूछता हूँ कि इन लोगों को तालियाँ बजाने का क्या हक है? भले हम मुंबई में रहते हैं लेकिन ये लोग बारहों महीने यहीं रहते हैं। क्या उन्हें आपके दुख, तकलीफें दिखाई नहीं देतीं? वे आपके दुखों के बारे में जानते जरूर हैं लेकिन वे आपके लिए कुछ भी करना नहीं चाहते। कुछ जमींदार काश्तकारों को कहते हैं कि तुम्हारा अम्बेडकर क्या करेगा? देख लेंगे? ये जमींदार क्या मेरी और अपनी औकात एक-सी समझते हैं? कोई भी जमींदार मेरे सामने आए तो बुद्धि के बल पर मैं आसानी से उसे हरा दूँगा। वे अगर मेरी तुलना अपने साथ कर रहे हों तो मैं कहूँगा कि कहाँ हिमालय परबत और कहाँ राख की ढेरी! मैं अमीर

* ख्., जनता, 28 मई, 1938