148 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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* आपसी फूट के कारण काम नहीं बनते
तय कार्यक्रम के अनुसार रविवार 22 मई, 1938 को दोपहर 4 बजे अखिल भारतीय अस्पृश्यों के इकलौते नेता परमपूज्य डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर की अध्यक्षता में पुणे जिला वतनदर महार परिषद को दूसरा........... अधिवेशन संपन्न हुआ। बड़ी संख्या में श्रोता उपस्थित थे। 1000 मीलों की यात्रा कर विधायक का. रा. भोले, के. रा. मंघाले, वरिष्ठ नेता रेवजी दगडूजी डोलस आदि के साथ डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर आए हुए थे। अस्पृश्य समाज के कल्याण के लिए दिन-रात मेहनत करने वाले विधायक रामभाऊ राव जी बोरीकर, मे. शंकर मोहन जी शास्त्री मे. मजोबा दुधावडे आदि लोग मुंबई से तथा पुणे से वि. बा. भालेराव, डी. सी. मिशन, गायकवाड मास्टर और वाल्हेकर आदि लोग आए थे। ठीक 4.30 बजे बाबासाहेब अपनी जगह स्थानापन्न हुए और सभा की औपचारिक शुरूआत हुई। मातंग समाज के ना. स. कालोखे और शं. स. कालोखे ने डॉ. बाबासाहेब के सम्मान में गीत पेश किया। उसके बाद स्वागताध्यक्ष केशव राणूजी शिशुपाल- ग्राम पंचायत के अध्यक्ष का स्वागत भाषण हुआ। उसके बाद उपस्थित श्रोत्र समाज के प्रति आभार व्यक्त किया गया। इसके बाद सटवाजी लक्ष्मण, किसन महादेव कालोखे, मे. मारूती शेबाजी गायकवाड़, विटठल का उपशाम, के. टी. भोसले, मे. मघले, में धोगे आदि लोगों ने प्रभावपूर्ण और भावपूर्ण भाषण हुए। इसके बाद तालियों की गड़गड़ाहट के बीच डॉ. बाबासाहेब बोलने के लिए खड़े हुए। उस वक्त चारों ओर जयकार की आवाज गूंज रही थी। डॉ. बाबासाहेब ने अपने भाषण में कहा-
हजार मीलों की यात्रा कर मैं इस परिषद् में उपस्थित रहने आया हूँ। पुणे जिले के महार लोग अन्य सभी जिलों के महार लोगों से बेहद अव्यवस्थित हैं। सुना है कि वे मरे हुए जानवर का मांस खाते हैं और जूठन भी खाते हैं। उनमें हमेशा आपसी झगड़े चलते रहते हैं। इन्हीं झगड़ों के कारण उनका कोई काम ठीक से नहीं बनता। धर्म के प्रति उनमें पागलपन है। मेरा भगवान में बिल्कुल विश्वास नहीं है। भगवान और धर्म के नाम पर कई तरह के पागलपन चलते रहते हैं। एक बार मैंने अपने ‘हिंदू’ मित्रों से शंकर भगवान की पिंडी के बारे में पूछा वह कुछ बता नहीं सकते। शिवलिंग क्या है इस बारे में यहाँ विस्तार से बताया नहीं जा सकता। वह केवल संभोग दृश्य है। ऐसे में धर्म के श्रद्धालु लोगों के द्वारा इक्ट्ठा कर एक दिन की यात्रा की खातिर धर्मशालाएँ
* ख्., जनता, 4 जून, 1938