137 17.6.1938 ब्रह्ममदेव भी चाहें तो हमारी राजनीतिक उन्नति रोक नहीं सकते - धुले - Page 175

154 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अपने कमरे में मंगा कर खाती है। दिन भर में चार बार पीतांबर बदलती है। पौडर लगाती है, कितना अच्छा है उसका जीवन। दूसरी लउ़की 7 रु. की रोजी पर हाथतोड़ मेहनत करती है। पति को जो एक-डेढ़ रुपये की दिहाड़ी मिलती है उसमें दिन गुजारती है। रांगे का कोई पतला, डोटी-सा गहना उसके गले में पड़ा है। नमक के साथ रोटी खाकर वह दिन गुजारती है, कई बार उसे फाके भी सहने पड़ते हैं। सो, बताइए, इन दो लड़कियों में से आप किसकी इज्जत करेंगे? देह बेच कर जो पीतांबर पहनती है उसकी या जिसे गरीबी ने, दुख ने परेशान किया है, खाने के लिए जिसके पास कुछ नहीं है, उसकी? मेरे ख्याल से सभी न्यायप्रिय लोग पतिव्रता महिला की ही इज्जत करेंगे।

सो, आपके पेट का ग़ा भरे या न भरे, आपका बर्ताव हमेशा बेहतर होना चाहिए। स्वाभाविमान, धीरज, नीतिमानता का दामन ना छोड़ें। अपना बर्ताव अच्छा है। या बुरा है, न्यायपूर्ण है, इज्जत दिलाने वाला है ना, इसका जरूर ख्याल रखें। इस सभा से लौटने के बाद नए कार्यक्रम की शुरूआत करें। (महिलाओं को उद्देश्य कर), आप भी अन्य महिलाओं ही की तरह हैं। हम आपका दूध पीकर बड़े हुए हैं। अन्य महिलाओं के बच्चे मामलतदार, हाईकोर्ट में जज आदि हैं और आपके बच्चे गडरिए हैं। इसकी वजह यही है कि आप नर्क में उल्झे हुए हैं। यह आपका पाप है। आपका बर्ताव अगर इसी प्रकार अशुद्ध रहा तो आपके बच्चे भी ऐसे ही रहेंगे। ‘नर करनी करे तो नर का नारायण बनो’ अन्य महिलाएँ भगवान का अवतार नहीं हैं। वे भी औरतें ही हैं आपकी तरह। उन्हें मौका मिला आपको नहीं मिला। इसीलिए, आप सभी स्वाभिमान और धैर्य के साथ जिएं। अपना लक्ष्य हासिल करने की जी-तोड़ कोशिश कीजिए।

डेढ़ घंटे तक इस प्रकार डॉ. अम्बेडकर द्वारा उपदेश भरा भाषण देने के बाद श्री पुनाजीराव ललिंगकर ने सबको धन्यवाद दिया। उसके बाद ‘डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर की जय’ की घोषणा के साथ सभा समाप्त हुई।