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मैं क्यों तैयार हुआ हूँ ऐसा आपको लगता है? मेरी और डॉ. खरे की मुलाकत का मौका आज से पहले कभी नहीं आया था। कल एक मित्र के जो श्री खरे के भी मित्र हैं यहाँ उनके दफतर में हमारी पहली बार मुलाकात हुई। जाहिर है कि उनकी राजनीति से आकृष्ट होकर मैं यहाँ नहीं आया हूँ। राजनीति के मामले में हम भिन्न और विरोधी ही हैं।
डॉ. खरे महाराष्ट्रीय हैं यह भी महत्वपूर्ण बात है। उनके बारे में हुए अन्याय के कारण कई महाराष्ट्रीयों के मन में विशेष क्रोध है यह बात निःसंशय सही है। यह बहुत सहज बात है। हिंदी राजनीति में महाराष्ट्रियों के इतिहास पर एक नजर डालें तो महाराष्ट्रीय पिछड़ते जा रहे हैं इस बात के बारे में मुझे कोई आशंका नहीं। आज तक महाराष्ट्रीय लोगों ने कभी व्यापार-व्यवसाय नहीं किया। इसलिए उन्होंने कभी विपुल संपत्ति या रुपया भी नहीं कमाया है। जब देश के अन्य हिस्सों के हिंदी लोग विदेशियों के जुल्मों से पीडि़त थे तब महाराष्ट्रीयनों के पुरखों ने अपनी सारी जिंदगी स्वराज का कामकाज चलाने में बिताई। इस काम में इनका खून भी बहा। क्यों महाराष्ट्रीय पिछड़ते जा रहे हैं इस बारे में कुछ दिन पूर्व एक काँग्रेसी नेता ने मुंबई में दिए अपने भाषण में विश्लेषण किया। उनकी राय में व्यवहार ज्ञान की कमी के कारण वे पिछड़ रहे हैं। लेकिन मैं उनकी इस बात से बिल्कुल सहमत नहीं हो सकता। मेरी राय में, महाराष्ट्रियों जितनी व्यवहार बुद्धि हिंदुस्तान के अन्य किसी प्रांत के लोगों में दिखाई नहीं देती। महाराष्ट्रीयों का पिछड़ना अन्य किसी कारण से हुआ हो भले, व्यवहार बुद्धि के अभाव में नहीं हुआ। महाराष्ट्रीयन का जीवन महाराष्ट्र की आजादी पाने के काम आया इसलिए महाराष्ट्रीयन पिछड़ गए। राजनीति करने, राज्य का कामकाज चलाने में उसका समय बीता। मेरे कथन का साक्ष्य इतिहास ही देगा। धनाढय श्रेष्ठी या धनपति का नाम आपको महाराष्ट्र के इतिहास में सुनाई नहीं देगा लेकिन सेनानी, कुटनीतिज्ञ, कुशल राजनीतिज्ञ के नाम आपको कदम-कदम पर सुनाई देंगे। दुनिया के किसी भी देश को फक्र हो ऐसे नाम हैं ये।
महाराष्ट्र पिछड़ा क्योंकि औरों की तरह महाराष्ट्र ने व्यवहार का मार्ग अपनाया नहीं। लक्ष्मी की कृपा पाने की कोशिश नहीं की। वे कभी उसके पीछे नहीं पड़े। लेकिन आज केवल पैसे की ही तूती बोलती है। पैसों ने बुद्धि पर कब्जा कर लिया है। बुद्धि और शील इन दोनों को पैसों ने मात दी है यही सच है।
किसी जमाने में हम राजनीति में सबसे आगे थे। तिलक, गोखले और रानडे ये तीन महाबुद्धिमान और राजनीति में धुरंधर व्यक्ति हमारे बीच थे। आज की तरह इनकी राजनीति हलचल मचाने वाली न हो भले, आज की तरह औत्सुक्यपूर्ण न हो भले लेकिन वह आज से अधिक ईमानदार और विचार प्रवर्तक थी। आज इस क्षेत्र में भी हम अड़े नहीं रहे। आज के हालात देखें तो ‘‘बाबू और मजदूर इन दो पेशों के अलावा जिनके पास कोई कर्तृता नहीं है ऐसे लोग’’, यही महाराष्ट्रीयों की हालत हो रही है। इस अवनति को ध्यान में रखते हुए