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बारे में आप जानते नहीं। इस मामले में साइमन कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की थी कि प्रांत की राजनीति पूरी तरह से जिम्मेदार होनी चाहिए। यह भले तय किया गया हो तथा कानून और व्यवस्था विभाग आरक्षित नहीं हाना चाहिए यह भल मान लिया गया हो, गवर्नर द्वारा नियुक्त मंत्रियों के साथ इस विभाग को मंत्रीमंडल में शामिल करें। यहाँ उपस्थित डॉ. मुंजे भी इस बात की पुष्टि कर सकते हैं कि साइमन कमीशन की इस सिफारिश को निरस्त करने के लिए सभी हिंदी प्रतिनिधियों ने किस प्रकार एकजुट हाकर टक्कर दी। इस सिफारिश के कारण सामुदायिक जिम्म्ेदारी का तत्व नष्ट हो जाएगा। यह हमारा कहना था। राज्य के संविधान में मुख्यमंत्री के स्थान पर सामुदायिक जिम्मेदारी का तत्व निर्भर है। इसे लागू करने के लिए दो बातों की जरूरत होती है। इस विषय का मैंने थोड़ा-बहुत अध्ययन किया है इसीलिए इस विषय पर बोलने का मेरा हक बनता है। सामुदायिक जिम्मेदारी के तत्व के लिए आवश्यक पहली बात यह होती है कि मुख्यमंत्री को अपने सहयोगी चुनने की पूरी आजादी मिलनी चाहिए। सामुदायिक जिम्मेदारी के तत्व को लागू करना हो तो यह अधिकार अन्य किसी को नहीं मिलना चाहिए। दूसरी आवश्यक बात यह कि, जो मंत्री नहीं चाहिए उसे निकालने के लिए कहने का अधिकार मुख्यमंत्री को होना चाहिए। मुख्यमंत्री के कारण हमें अधिकार का पद मिला है और इस पद से हटाना भी उनके ही हाथ में है ये बातें जब तक सभी मंत्रियों क मन में उतर नहीं जातीं तबतक सामुदायिक जिम्मेदारी के तत्व पर कामकाज किया जाना संभव नहीं। हर मंत्री को इस बात का अहसास हो तभी इस महत्वपूर्ण तत्व पर अमल संभव है।
मंत्रीमंडल के मंत्रियों का चुनाव करने का हक, अधिकार और काम मुख्यमंत्री का नहीं बल्कि अपना है यह बार्किंग कमेटी का कहना सामुदायिक जिम्मेदारी क सिद्धांत से बिल्कुल मेल नहीं खाता। वर्किंग कमेटी द्वारा मंत्रियों के शासन के बारे में भी एक बात अपने हक में होने की बात कही गई है। वर्किंग कमेटी का कहना है कि किसी मंत्री को शासन देना है या नहीं इसका निर्णय लेने का अधिकार वर्किंग कमेटी जैसी बाहरी संस्था का है।
गृहस्थ ही, हम यह जानते ही हैं कि जिम्मेदार राजनीति का यही स्वीकृतविद्ध है कि जिन्होंने चुनाव में जिता दिया उनके अलावा अन्य किसी के प्रति मंत्री को जिम्मेदार नहीं रहना होता। लेकिन वर्किंग कमेटी ने मतदाताओं को पूरी तरह दर-किनार कर दिया है।
वर्किंग कमेटी की शायद यही सोच है कि मतदाता कुछ नहीं होता। संक्षेप में वर्किंग कमेटी ने मतदाताओं को चूहे जितनी हैसियत अदा की है। तय दिन वह आए, ताकीद के अनुसार अपना वोट दर्ज करे और फिर लात खाकर फिर पिजंड़े में अपनी जगह जाकर बैठे। बस इतना ही उसका काम है, इतनी ही उसकी भूमिका है। वर्किंग कमेटी द्वारा अमल किए गए सिद्धांतों का अर्थ बस इतना है।