162 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
मुख्यमंत्री के मौलिक अधिकारों के लिए डॉ. खरे की लड़ाई जारी है। इसीलिए मैं उनका स्वागत करता हूँ। उनकी इस लड़ाई में उनका समर्थन करना हमारा कर्त्तव्य है। अब आखिर में एक-दो साधारण बातें बताकर मैं अपना भाषण पूरा करता हूँ। ये बातें बताते हुए डॉ. खरे के कुछ वाक्यों का जिक्र मुझे करना पड़ेगा। इसके लिए, उम्मीद है कि वे मुझे माफ करेंगे। उन्होंने कहा, ‘‘हम काँग्रेस में ही रहने वाले हैं। काँगे्रस में ही वह कर जिस टोली ने हमारे साथ इतना नीच बर्ताव किया उस टोली से हमें भिडना है।’’ अर्थात् अगर वे ऐसा करते हैं तो हमें कोई आपत्ति नहीं है, हाँ उन्हें इस काम में कितनी सफलता मिलेगी इस बारे में मुझे संदेह है। डॉ. खरे प्रधान मंत्री (मुख्य मंत्री) थे तब उनके हाथ में सारे अधिकार थे। मध्य प्रांत के मुख्यमंत्री के रूप में उन्हें सम्मान का स्थान प्राप्त था। उनके पास वैभव था। लेकिन इतनी बातें वश में होने के बावजूद वर्किंग कमेटी के खिलाफ वे कुछ कर नहीं पाए। फिर अब केवल काँग्रेस पक्ष के एक सामान्य सदस्य के रूप में वह कैसे प्राप्त कर पाएंगे यह मेरी समझ में नहीं आता। लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनका धैर्य अधिकार के पद पर रहते हुए नहीं वरन् उस पद से पदच्युत होने के बाद ही प्रखरता से प्रकट होता है। डॉ. खरे भी हो सकता ऐसे ही अपवादात्मक व्यक्ति के धनी हों।
मैं यहाँ राजनीतिक प्रचार पाने के लिए नहीं बोल रहा हूँ। मुझे यहाँ अपने पृथक मजदूर पक्ष के लिए सदस्य पाने के लिए भी भाषण नहीं देना है। हालांकि एक बात मैं साफ तौर से और मन से कहना चाहता हूँ कि तुम अगर लोकतंत्र चाहते हो तो तुम्हें दो बातें करनी होंगी। लोकतंत्र के लिए जरूरी पहली बात है पक्ष पद्धति। दो पक्ष होने चाहिए, जिनमें से एक सत्ता में होगा और दूसरा विपक्ष में। विरोध करने वाला, विपक्ष न हो तो जनता देश के कामकाज में ध्यान नहीं दे सकेगी।
हर बात के दो पहलु होते हैं। इतना ही नहीं किसी मसले के दो पहलु हैं यह दिखाना ही राजनीतिज्ञ व्यक्ति का काम, या कहें कर्त्तव्य होता है ऐसा हाल ही में स्टेट्समन नाम के अंग्रेज कूटनीतिज्ञ ने कहा है। भले उस मसले के दो पक्ष हों या न हों। हर सवाल के दो पहलु होते हैं यह हमें समझना होगा। काँग्रेस जो बता रही है वह इस सवाल का एक पहलु हुआ। उसका कोई दूसरा पहलु नहीं है यह नहीं मानना चाहिए।
एक और बात हमें सीखनी पड़ेगी कि हमेशा सरकार को कसौटी पर कसे बगैर लोकतंत्र का सुरक्षित रहना संभव नहीं। राजतंत्र था एक सत्ता और लोकतंत्र या लोगों की सत्ता के बीच फर्क क्या है? राज्य विज्ञान के पंडित इसकी क्या परिभाशा देंगे मैं नहीं जानता लेकिन एक राजनीतिज्ञ के नाते मुझे इसमें यही फर्क दिखाई देता है कि राजतंत्र में सरकार की कसौटी या पूछताछ कभी नहीं होती। एक बार स्थापित होने के बाद वह हमेशा के लिए चलती रहती है फिर चाहे वह हिंदी संस्थानों की तरह वंश-परंपरा के अनुसार चले या कुछ यूरोपीय देशों की तरह विशिष्ट तानाशाही पद्धति से चले। वह चाहे जिस तरह चले,