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एक बात साफ है और वह यह कि लोकतंत्र में सरकार के लिए हर पल कसौटी का होता है। हर दिन सरकार को अपने अस्तित्व का समर्थन देते रहना पड़ता है। अपनी हर कृति की योग्यता के बारे में जवाब देते रहना पड़ता है। राजतंत्र में ऐसा नहीं होता। अगर आप सुरक्षा चाहते हैं, उन्नति होनी चाहिए ऐसा अगर आपको लगता हो तो, प्रगति होनी चाहिए ऐसी अगर आपकी इच्छा हो तो सब लोग एक ही संस्था से चिपक कर ना रहें। फिर और लोग जो चाहे कहें। आप उसकी फिकर ना करें। मेरे कर्तत्व के लिए मेरी बुद्धि के लिए योग्य जगह काँग्रेस में मिल नहीं पा रही है इसलिए मैं काँग्रेस में नहीं जा रहा हूँ ऐसी बात नहीं है। मुझे वहाँ सबके बीच छिपा देना किसी के बस की बात नहीं। मैं काँग्रेस में नहीं जाता उसकी वजह यह है कि मुझे उस संस्था से अलग रहना ही मुझे आवश्यक लगता है। समीक्षक की भूमिका अपनाते हुए हर मसले का दूसरा पहलु उजागर करना मुझे बेहतर लगता है। जनता को कोई धोखा न दे सके इसीलिए मुझे यह काम अच्छा लगता है।
अपने लोगों की चारित्रिक विशेषता एक बार फिर प्रकट हो रही है इसका मुझे आजकल अहसास होने लगा हैं। इगलैंड में चल रही जिम्मेदार राजनीतिक सत्ता अपने देश में भी स्थापन करने के लिए हमने संघर्ष किया और अपने संविधान में उसे शामिल करवाया। लेकिन लगता है कि यह राजसत्ता कुछ अलग ही और विशिष्ट रूप धारण करती जा रही है। कई सालों से हमें एक जिम्मेदार राजनीतिक सत्ता नहीं मिली है। अब तक हम पर राजाओं का ही शासन चलता रहा। अपना भविष्य किसी और के हाथों सौंप कर निश्चित हो जाना हमारी आज तक की खासियत रही है। अपना मालिक ही अपना भगवान है और उसकी पूजा करते रहना ही अपना धर्म है यह हमारा आज तक का भाव रहा है। हमारी यही खासियत आज एक बार फिर स्थापित होने की राह पर है। मालिक जो कहे वही सही। उसके काम की समीक्षा करना उसके खिलाफ बोलना हमारा काम नहीं मतदाता का ऐसा सोचना इसी सोच की देन है। ऐसी अंध भक्ति से राजनीति कभी सफल नहीं हो सकती। जिम्मेदार राजनीति को अमल में लाना हो तो सरकार को कसौटी पर कसने के लिए सहसजता से अपने रुख को एक तरफ से दूसरी तरफ मोड़ने के लिए तैयार जनसमुदाय की जरूरत होती है। इस तरह का जनसमुदाय अगर निर्माण ना हो तो शायद अंग्रेजों से हम जो सत्ता हासिल करेंगे वह बहुजन समाज के हाथ में आने के बजाय किसी गिरोह के हाथ में जाएगी और पता चलेगा कि हालात पहले से बदतर हो गए हैं। इससे ज्यादा मैं कुछ कहना नहीं चाहता। आखिर मैं डॉ. खरे से इतना ही कहूंगा कि हम आज यहाँ इसलिए इक्ट्ठा हुए हैं ताकि बहुजन समाज को राजनीतिक नजरिए से महत्वपूर्ण मसलों पर जहाँ तक संभव है समर्थन दे सके। यह मसला पक्ष विशिष्ट राजनीति की सीमा से हट कर है। इसीलिए इसका तालुक सबके साथ है। डॉ. खरे की इस लड़ाई में उनकी संपूर्ण सफलता की कामना मैं करता हूँ। डॉ. अम्बेडकर के भाषण के बाद डॉ. खरे का भाषण हुआ। उसके बाद श्री ना. म. जोशी द्वारा छोटा-सा भाषण और धन्यवाद ज्ञापन के बाद समारोह संपन्न हुआ।