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युवक धीरे-धीरे बड़े होंगे। हो सकता है उनकी संख्या भी धीरे बढ़ेगी। और क्या पता मुझे भी प्रधानमंत्री बनाने का मौका मिलेगा। डॉ. खरे पर आई विपत्ति के बारे में अगर मैं चुप रहा तो आज जो विपत्ति उन पर आई है कल मुझ पर आ सकती है। इसलिए, आगे आने वाले समय को ध्यान में लेते हुए इस विवाद में एक पराया व्यक्ति बन कर चुप बैठे बगैर मेरा जो मानना है उसे आपके सामने व्यक्त करने के लिए तथा डॉ. खरे के साथ मित्रता बनाने की मेरी इच्छा है इसलिए मैं आज यहाँ बोलने के लिए खड़ा हूँ। हालांकि मैं यह भी जानता हूँ कि इस नाटक के नायक डॉ. खरे के रंगभूमि पर आकर जाने के बाद मेरे जैसे दोयम पात्र की बातों में किसी को कोई दिलचस्पी नहीं हो सकती है।
उस वाकये से गुजरने के बाद डॉ. खरे हमारे प्रांत में आए हैं। उन्होंने जो भाषण दिए वे मैंने ध्यानपूर्वक पढ़े हैं। प्रतिपक्षों के आपसी झगड़े पढ़ना या सुनना मनोरंजक तो होता ही है लेकिन मैंने मनोरंजन के लिए उनके झगड़े नहीं पढ़े। इस विवाद के कारण सामने आए कुछ मुद्दे बेहद महत्वपूर्ण हैं और हमें उन पर ध्यान देना चाहिए।
इस विवाद में सामने आए प्रमुख मुद्दे इस प्रकार हैं- आज के संविधान में प्रधानमंत्री के क्या अधिकार हैं? डॉ. खरे का यह कहना ह कि मंत्रीमंडल के सभी मंत्रियों का चुनाव मुख्यमंत्री को करना होता है और बाहर के किसी व्यक्ति को उसमें दखल नहीं देनी चाहिए और मंत्रीमंडल का कोई मंत्री अगर नालायक, लुच्चा या झगड़ालू निकले तो उसे निकालने का अधिकार मुख्यमंत्री को है। काँग्रेस वर्किंग कमेटी का कहना इसके बिल्कुल विपरीत है। उनका कहना है कि किसे मिनिस्टर नियुक्त करना है, उसे कब हटाना है इसका फैसला करने का अधिकार उन्हें है, प्रधानमंत्री को नहीं।
यहाँ मुख्य सवाल यह है कि मंत्रीमंडल का कामकाज अगर ठीक नहीं चल रहा हो तो उन्हें शासन करने का अधिकार किसे है।? मुझे लगता है कि जिन्होंने उन्हें चुन कर भेजा उन्हें ही मंत्रीमंडल को सजा देने का अधिकार है। यानी जिन हजारों मतदाताओं ने उन्हें चुना उन्हें यह अधिकार पहुँचता है। वर्किंग कमेटी का यह कहना है कि मंत्रीमंडल को शासन देने का अधिकार मतदाताओं को नहीं बल्कि उन्हें है। पिछले एसेंब्ली चुनावों में वल्लभभाई ने जिन लोगों को खड़ा किया वे सब पत्थर हैं उनके कोई अधिकार नहीं हैं।
वल्लभ भाई पटेल, गांधी, बजाज, राजेन्द्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू आदि चुनाव में उतरे नहीं। मतदाताओं ने उनहें किसी तरह का काई अधिकार नहीं दिया है। ये सब बगुलाभगत हैं। जिम्मेदार राजनीति का मतलब है न्याय करने वाली आखरी संस्था यानी मंत्रीमंडल और उसे चुनने वाला चुनाव क्षेत्र। इस नजरिए से देखा जाए तो पता चलता है कि न्याय और सत्य डॉ. खरे के पक्ष में है और वर्किंग कमेटी के साथ न न्याय है और न सत्य।
यह सब ठीक है। लेकिन आगे क्या यह सवाल अधिक महत्वपूर्ण है। डॉ. ख्रे का आगे क्या होगा सोचता हूँ तो मेरे मन में हलचल पैदा होती है। इस वक्त मुझे अपने वचपन की एक बात याद आती है। हम जिस गाँव में रहते थे वहाँ हमारे पड़ोस में एक परिवार रहता था। उनकी 10-12 साल की एक बच्ची थी। वह जब शादी योग्य उम्र की हुई तब उसके