166 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
माता-पिता ने एक अच्छा लड़का देखकर उसका ब्याह करवा दिया। बेटी फिर ससुराल में रहने गई। वह वहाँ खुश है। सोच कर माता-पिता इत्मीनान से अपने गाँव में रहे। शादी को 10-12 महीने ही गुजरे होंगे कि एक दिन बिना कोई चिट्ठी-पत्री के किसी पड़ोसी के साथ बेटी अपने माता-पिता के दरवाजे में आकर खड़ी हुई। वह बेहद जोर से हुमक-हुमक कर रोने लगी। माता-पिता की समझ में नहीं आ रहा था कि बेटी को हुआ क्या है? अच्छे पढ़े-लिखे लड़के के साथ शादी करा दी, फिर अचानक यह सब क्या हुआ? माँ ने अपनी बेटी को सीने से लगाया। क्या हुआ पूछा। बच्ची ने बताया कि किस तरह ससुराल में उसके साथ गलत व्यवहार होता था, उसके साथ मार-पीट होती थी, किस तरह उसे सताया जाता था। अपने सारे दुःखों को उसने माँ-पिता के आगे गिनाया। उसके बदन से माँ ने हाथ फेरा तब पता चला कि बेटी के सिर में बड़ा जख्म है। माँ ने उनकी चोली उतार कर देखा तो पता चला कि उसकी पीठ और छाती पर पिटाई के निशान हैं। पिटाई से बेटी का बदन भी सूजा है। पीठ पर पिटाई के कारण बड़े निशान बने हैं। माँ बेचारी ने बेटी के बदन में तेल-हल्दी लगाई। कुछ दिनों बाद बेटी कहने लगी कि जिस चूल्हे के साथ आपने मुझे बाँधा है वहीं मेरा जो भला-बुरा होना है, होगा। आप मुझे ससुराल भेज दीजिए। लड़की ने जिद् ही पकड़ ली। माता-पिता ने बच्ची को साड़ी चोली-चूडि़याँ दिलाईं। माथे पर बिंदी लगाई, नारियल से गोद भरी और बेटी को ससुराल भेज दिया। लड़की फिर ससुराल अपना घर बसाने निकली। ससुराल के लोग कहने लगे कि लड़की कितनी संस्कारी है देखो। हमारे यहँ घर बसना उसे कबूल है। लेकिन उसके माता-पिता ही उसके कान भरते हैं। इस प्रकार लड़की ससुराल में प्यारी बनी और उसे उसके संकट के समय में सहारा देने वाले माता-पिता उसके दुश्मन हुए। लेकिन लड़की की सास बड़ी दुष्ट थी। उसके बर्ताव में कोई फेर नहीं आया। दुर्भाग्य से इस लड़की के कोई संतान नहीं हो रही थी। यही कारण काफी था। उसने एक दिन अपने बेटे के कान भरे कि तुम दूसरी शादी करो। लड़की के माता-पिता के सामने अब बड़ी दुविधा आनी खुड़ी हुई। लड़की को अपने घर ले आएँ तो वह इतनी बेवकूफ कि फिर कहे कि मुझे ससुराल जाना है। इसलिए उन्होंने उसकी ओर ध्यान ही नहीं दिया। पति ने दूसरी शादी की। दूसरी पत्नी के बच्चा हुआ। सबका ध्यान उसी पर रहा। इसकी उपेक्षा होने लगी। आखिर उसे तपेदिक हुआ। कुछ समय छीज-छीज कर आखिर वह मरी। डॉ. खरे की हालत कुछ हद तक मेरे पड़ोसी के बेटी जैसी ही है। काँग्रेस में उनके साथ नाइंसाफी हुई। अपने साथ हुए अन्याय की शिकायत लेकर वह महाराष्ट्र में अपने सगे-संबंधियों के पास आए हैं। इतने अन्याय के बाद भी जिस प्रकार उस लड़की का ससुराल में ही रहने का हठ था उसी प्रकार डॉ. खरे भी कहते हैं, ‘‘मैं काँग्रेस में ही रहूँगा।’’ उस लड़की की तरह छीज कर मरने की नौबत उन पर न आए, बस।
डॉ. खरे के साथ जो अन्याय हुआ है उसे पोंछ कर हटाया नहीं जा सकता। जनतंत्र के सिद्धांत इस प्रकार रौंदे न जाएँ यही सोच इस घटना को जानने के बाद सबके मन में होना चाहिए। जिन पत्थरों ने याकि कहिए भगवानों ने डॉ. खरे की बलि ली, वे किसी और को बली नहीं चढ़ाएंगे इसका क्या भरोसा? डॉ. खरे कहते हैं कि सब काँग्रेस में आएँ। काँग्रेस