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के कुछ लोगों का यह कहना है कि काँग्रेस में गंदगी है जिसे आप काँग्रेस में शामिल होकर उखाड़ फेंके। इस पर मेरा यही कहना है कि गंदगी आप फैलाएंगे तो जाहिर है कि उसे साफ भी आप ही को करना है। मैं अपने साफ कपड़े पहनकर आकर उस गंदगी को क्यों साफ करूं? आप अपनी गंदगी को साफ कीजिए फिर हम सोचेंगे कि अपने साफ कपड़ों के साथ हमें काँग्रेस में जाना है या नहीं। इससे एक और सवाल पैदा होती है कि क्या एक ही राजनीतिक पक्ष होना ही क्या सही है? सबका अपनी शिखा काँग्रेस में फंसाना क्या सही होगा? मुझे लगता है कि एक ही पक्ष होना देश की उन्नति के हित में नहीं है। जिस देश में एक से अधिक राजनीतिक पार्टियां नहीं हैं वहाँ बुद्धि का विकास संभव नहीं। वहाँ आजादी मिलना भी असंभव है। आखिर डॉ. खरे से मैं एक विनति करने वाला हूँ। किसी ने मुझसे कहा कि मुंबई के ‘प्रभात’ अखबार में मध्यप्रांत के मंत्रीमंडल के बारे में लिखा है कि, डॉ. खरे चक्की में हैं और बुंबई के मुख्यमंत्री बाबासाहेब खेर थाली में। यानी खरे के बाद बाबासाहब खेर की बारी तो आनी ही है। लेकिन मुझे लगता है कि हमारे बाबासाहेब कभी भी इस तरह थाली में अपनी बारी का इंजतार नहीं करेंगे। अच्छी बहू को हम सुलक्षणा कहते हैं। बाबासाहब खेर का वर्तन सुलक्षणा बहू के समान है। सुलक्षणा बहू में क्या गुण होते हैं? वह जेठ के, सास-ससुर के, नंनद के, जेठानी के सबके आते-जाते पैर छूती है। सबके साथ मीठा बोलती है। कभी किसी को पैर न लगे इसका ख्याल रखती है। नीचे झुकने से पहले पैर पीछे से खुला नहीं है इसका ख्याल है। हर रोज पति के नाम से माथे पर कुंकु-यह शांता आपटे वाला कुंकु नहीं लगाती है। पति के सुयश की कामना करती है। सावित्री की तरह हर जन्म में यही पति मिलने की कामना करती है। बाहर वालों को अगर अपने ससुराल वाले गालियाँ देते हैं उससे दुखी न होने वाली आदि। हमारे बाबासाहब खेर बिल्कुल इसी तरह बरते हैं। इसीलिए मुझे लगता है कि 12 महीने ही नहीं 12 सालों तक हमारे बाबासाहब काँग्रेस में रहते हुए मुख्यमंत्री बने रहेंगे। जाहिर है कि थाली में या खौलते पानी में गलने के लिए वे कभी पड़ेंगे नहीं। एक बच्ची को हिंदी घर ब्याहा उसका यह हाल बुरा हुआ, एक बच्ची को गुजरात में ब्याहा उसका ठीक चल रहा है यह देख कर दुख में भी संतोष महसूस होता है। लेकिन काल की गति विचित्र है। हो सकता है हमारे बाबासाहब भी कभी चक्की में गिरेंगे। ऐसा अगर कभी हुआ तो जिस प्रकार डॉ. खरे मुंबई आए उसी प्रकार खेर नागपुर जाएंगे। ऐसा हाल हुआ तो डॉ. खरे से मेरी विनति है कि वे खेर की पीठ पर अपना हाथ जरूर फेरें। (हंसी के ठहाके और तालियों की बौछार)।
इसके बाद डॉ. मुंजे और रा. वर्दे के भाषण हुए। बाद में अध्यक्ष श्री जमनादास मेहता के भाषण के बाद सभा का कामकाज पूरा हुआ।
श्री जमनादास ने कहा कि ठगों की टोली में श्री खरे के साथ न्याय नहीं हुआ इसका उन्हें अर्चज नहीं लगता। जनतंत्र के खिलाफ कारस्तानी करने वाले गुट को क़ैद करना डॉ. खरे के लिए जरूरी था, ऐसा भी उन्होंने कहा।