168 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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लंबे समय तक मेहनत और कोशिश करने से ही सफलता
मिलती है
‘‘रविवार दिनांक 11 सितम्बर, 1938 के दिन पुणे के अस्पृश्य छात्रों का 11वां सम्मेलन पुणे के डी.सी. मिशन हॉल में आयोजित किया गया था। इस सम्मेलन के अध्यक्ष और प्रमुख वक्ता के तौर पर डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को चुना गया था।
सम्मेलन में पूर्व शनिवार और रविवार के दिन छात्रों के मर्दानी और मैदानी खेल, एक नाटक, वक्तृत्व स्पर्धा और भोजन आदि कार्यक्रम बड़े उत्साह के साथ संपन्न हुए थे। इस काम के लिए सम्मेलन सचिव मि. टी. बी. भोसले तथा उनके सहयोगियों ने काफी मेहनत की थी। सम्मेलन के अध्यक्ष श्री राजाराम भोले, एम.एल.ए. द्वारा सम्मेलन के आयोजकों का मनोबल बढ़ाया और उनकी सहायता की जिस कारण इस वर्ष सम्मेलन विशेष रूप से सफल रहा कहें तो अत्युक्ति नहीं होगी। इस वर्ष सम्मेलन के सचिवों में सुश्री घटकांबले नामक छात्रा ने सबके सहयोग में काफी काम किया। कॉलेज की वह पहली छात्रा है।
सम्मेलन के प्रमुख सचिव मि. भोसले ने अपने भाषण में पिछले 10 सम्मेलनों की संक्षेप में जानकारी देते हुए उनका महत्व बताया। इस सम्मेलन में विधायक भाऊराव गायकवाड, डी.जी. जाधव के. एस. सांवत, रोहम, वराले, काले, वॅकवर्ड कलास अफसर श्री देवधर, भा. द. कदे्रकर, श्रीमती गीताबाई गायकवाड, श्री बाबुराव भातनकर, गंगाधर घाटगे, सुपरवाइजर श्री ढिखले, के. आर. मधाले आदि लोग उपस्थित थे।’’ ख्1,
11वें अस्पृश्य विद्यार्थी सम्मेलन ने अपने अध्यक्षीय भाषण में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने कहा-
‘‘आज का सम्मेलन छात्रों का होने के बावजूद यहाँ उपस्थित लोगों को देखकर लगता है कि यहाँ छात्रों से अधिक अन्य लोग उपस्थित हैं। चावल की खिचड़ी में चावल से अधिक दाल पड़े वैसी आज यहाँ की हालत है ऐसा लगता है। यह विद्यार्थी सम्मेलन है इसलिए उन्हें उपदेश के दो शब्द कहना मेरा कर्त्तव्य है ऐसा मैं मानता हूँ। क्योंकि मैं आज यहाँ छात्रों के सम्मेलन के लिए ही आया हूँ। आज के सम्मेलन की अध्यक्षता स्वीकारते हुए कार्यकारी मंडल के आगे मैंने कुछ शर्तें रखी थीं। विद्यार्थी मंडल द्वारा वे
- जनता, 1 अक्तूबर, 1938