169
सभी शर्तें मान ली गई हैं शायद इसलिए आज के इस सम्मेलन का वैभव और सौंदर्य हो सकता है थोड़ा कम हुआ है। मेरा आज का भाषण मुख्य रूप से केवल छात्रों के लिए होने के कारण अन्य लोगों के लिए हो सकता है वह नीरस लगे लेकिन मुझे लगता है कि छात्रों को वह जरूर पसंद आएगा। छात्रों ने मुझे यह मौका दिया इसलिए उनका शुक्रिया अदा करना मैं अपना कर्त्तव्य समझता हूँ।
आजकल मेरा जीवन गाँव के अनपढ़, अज्ञानी, जुल्मों से परेशान लोगों की शिकायतें सुन कर उनकी दिक्कतें दूर करने की कोशिश में तथा उनकी चिंता करने में बीत रहा है। इसीलिए छात्रों की ओर जितना ध्यान देना चाहिए उतना देने के लिए समय नहीं मिलता। सो कुछ लोगों को लगता है कि मैं छात्रों की ओर ध्यान नहीं दे रहा हूँ। कभी-कभी उनकी बातों में यह भाव झलकता भी है। लेकिन एक बात मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि एक व्यक्ति अपने जीवन में विविध तरह के काम बेहतर तरीके से नहीं कर सकता। इस बारे में एक लेखक का कहा सुभाषित मुझे याद आ रहा है- ‘‘If you want success you must be narrow minted.’’ इसमें बहुत बड़ा अर्थ छिपा है। क्योंकि सब कुछ अकेले करना किसी एक व्यक्ति के लिए असंभव होगा। इसलिए कोई एक काम ढंग से करने के बजाय दस काम हाथ में लेना ठीक नहीं। अपने समाज के संदर्भ से अगर सोचें तो हमारे समाज के पास साधन सामग्री अत्यल्प है। इसलिए हमें चाहिए कि छोटे-छोटे काम हाथ में लेकर उन्हें पूरा करें। यही बेहतर कोशिश होगी। इसीलिए दीन-दुर्बल, समाज के जुल्मों से परेशान अनपढ़ समाज के काम का बोझ मैंने अपने सिर पर लिया है। इस काम के कारण छात्रों की ओर जितना ध्यान दिया जाना जरूरी है उतना दिया नहीं जा सकता। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं छात्रों के खिलाफ हूँ। उल्टे, मैं भले राजनीति, समाज-कार्य में व्यस्त रहूँ, मैं खुद जीवनपर्यन्त छात्र ही रहूँगा। सो एक छात्र दूसरे छात्र के खिलाफ कैसे हो सकता है? पढ़ाई के लिए जरूरी किताबें मुझे बार-बार
खरीदनी पड़ती हैं। आज की तारीख में मुझ पर किताबों के रु. 1000/- बकाया है। इसके बावजूद मेरी बड़ी साख है। वह अभी खत्म नहीं हुई। मुंबई की किसी भी दुकान से मैं किताबें उधार ला सकता हूँ। लेकिन मैं अपने विद्यार्जन में व्यवधान नहीं आने देता। आज विद्यार्जन मेरी बड़ी लत बन गई है। सो मैं छात्रों के खिलाफ कैसे हो सकता हूँ?
विद्यार्जन के बाद गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के बाद छात्र कैसे बरतें इस बारे में उपदेश देने के लिए मैं अयोग्य हूँ। क्योंकि मेरा गृहस्थाश्रम बेकार हो गया है। हालांकि छात्र होते हुए उन्हें कैसे बरतना चाहिए इस बारे में मैं जरूर कुछ बातें बता सकता हूँ। पिछले हजारों सालों से जिस समाज के किसी व्यक्ति को शिक्षा नहीं मिली थी उस समाज के कई लोग अब विश्वविद्यालयों से बीए और एमए की उपाधियां लेकर निकलते हैं यह देखकर किसे संतोष नहीं होगा? पहले हमारे समाज में ढूंढ कर भी कोई बी.ए. की उपाधि प्राप्त व्यक्ति नहीं मिलता। पहले कभी कृष्णा जिले का हमारे समाज के एक