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की तरह मैं एक महार महिला के पेट से पैदा हुआ हूँ। गरीबी के बारे में कहें तो आज जो गरीबों में गरीब छात्र हैं उनसे अलग मेरी स्थिति नहीं थी। अच्छी सहूलियत या कोई अन्य अनुकूलता मेरे लिए थी नहीं। मुंबई में डेवलपमेंट डिपार्टमेंट की चॉल के दस बाय दस के कमरे में माता-पिता और भाई-बहनों के साथ रह कर एक पैसे के मिट्टी के तेल के दिए की रोशनी में मैंने पढ़ाई की है। उस जमाने में अगर कई मुश्किलों और संकटों का सामना कर मैं इतना कर पाया तो आप आज के साधन-सामग्री से परिपूर्ण समय में क्या कुछ नहीं कर सकते? कोई भी इंसान लगातार कोशिशों से ही पराक्रमी और बुद्धिमान बन सकता है। कोई भी इंसान पैदायशी बुद्धिमान या पराक्रमी नहीं होता। छात्रकाल में इंग्लैंड में मैंने 8 सालों का पाठ्यक्रम 2 साल 3 महीनों में सफलतापूर्वक पूरा किया। इसके लिए दिन के 24 घंटों में से 21 घंटे मुझे पढ़ाई करनी पड़ी। आज मेरी उम्र 40 से अधिक है लेकिन आज भी मैं 24 में से लगातार 18 घंटों तक कुर्सी में बैठकर काम करता रहता हूँ। आजकल के युवाओं को तो लगातार आधे घंटे तक कुर्सी में बैठकर काम करने के लिए चुटकियाँ भर-भर कर सुंघनी सूंघनी पड़ती है। या फिर सिगरेट पीते हुए हाथ-पैर तान कर कुछ समय ऊंघे बगैर काम नहीं किया जा सकता। इस उम्र में भी मुझे इनमें से किसी चीज की जरूरत महसूस नहीं होती।
लगातार मेहनत और कोशिश करने से ही सफलता मिलती है। केवल डिग्रियाँ या उपाधियाँ प्राप्त करने से कुछ नहीं होगा। क्योंकि उपाधियाँ ज्ञान नहीं होती। उपाधियाँ शिक्षक के बिना ज्ञानार्जन के लिए इक्ट्ठा की गई साधन-सामग्री है। विश्वविद्यालय की उपाधियाँ और बुद्धिमत्ता का कोई आपसी तालुक नहीं। इस संदर्भ में एक सोचने लायक उदाहरण मैं आपको देना चाहूँगा। 7वें एडवर्ड की मृत्यु के बाद जब पंचम जॉर्ज 1911 में सत्तासीन हुए तब एक बार हिंदुस्तान आकर लौटने के बाद हिंदुस्तान के विश्विद्यालयों के उन्होंने कई लाख रुपयों की ग्रैंट दी। उस ग्रैंट की रकम का उपयोग कर गणित में प्रवीण एक प्रोफेसर को भारत बुला कर उसके ज्ञान का फायदा यहाँ के लोगों को देना तय हुआ। इस दौरान मद्रास में रेलवे के दफतर में महीना 20 रु. की तनख्वाह पर काम करने वाला रामानुज नाम का एक बाबू था। अपना काम निभाते हुए उसके मन में इस गणितज्ञ का भाषण सुनने की जबर्दस्त इच्छा पैदा हुई। उसने विनति की कि आपके भाषण के लिए उपस्थित रहने की इजाजत मुझे मिले। हालांकि रामानुज केवल मैट्रिक पास था इसलिए उस गणितज्ञ को पहले लगा कि रामानुज को उसकी बातें समझ नहीं आएंगी। हालांकि अगर रामानुज आना चाहे तो उसे कक्षा में उपस्थित रहने की अनुमति दी गई। रामानुज ने उस प्रोफेसर के पांच-छह भाषण सुने। लेकिन हर भाषण के दौरान गणित के उस विद्वान का भाषण सुनने के बजाय वह अपने नोटबुक में कुछ और ही लिखता रहता था। इस कारण गणित के उस विद्वान को बेहद गुस्सा आया और उन्होंने उसे बहुत बुरा-भला कहा कि मिले हुए मौके का तुम सही इस्तेमाल नहीं कर रहे हो।