141 11.9.1938 लंबे समय तक मेहनत और कोशिश करने से ही सपफलता मिलती है - पुणे - Page 194

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चालाकी करने के लिए बुद्धि और चतुरता की जरूरत होती है। लेकिन चतुरता और बुद्धि को अगर सदाचार का साथ मिले तो वह चालाकी या धोखाधड़ी नहीं करेगा। इसीलिए पढ़े-लिखे लोगों का शीलवान होना जरूरी है। अगर पढ़े-लिखे लोगों में शील न हो तो उनकी शिक्षा में ही समाज का और देश का विनाश है। सो शिक्षा से भी अधिक शील की कितनी अधिक जरूरत है यह आपकी समझ में आ ही गया होगा। इसीलिए, हर इंसान में पहले शील होना जरूरी है।

भाषण पूरा करने से पूर्व राजनीति के बारे में दो शब्द बताना मैं अपना कर्तव्य मानता हूँ। हममें से अधिकतर लोग गरीबी के कारण विद्या का उपयोग पेट भरने के अलावा किसी काम के लिए नहीं करते। मैं इसके लिए उन्हें दोष नहीं देता। पढ़े-लिखे लोगों के सामने जो दिक्कतें हैं उन्हं नजरंदाज करने से काम नहीं चलेगा। आज स्पृश्य समाज अधिकारारूढ़ है। सो स्पृश्य माने गए समाज की हालत संतोषजनक है। सभी तरह से उनके जीवन की तरह आसान है। उनके खिलाफ आपकी राह में संकट ही संकट खड़े हैं। आपका मार्ग कांटों से भरा हुआ है। किन उपायों से उस मार्ग को आसान बनाया ज सकता है इस बारे में आप सब लोगों को अभी से सोचना पड़ेगा। हमारे समाज के सामने चारों ओर केवल मुश्किलें ही हैं। उन्हें पूरा गिनना भी असंभव है। हम अल्पसंख्य हैं। संख्याबल के सहारे स्पृश्य समाज आज हम पर जो जी चाहे जुल्म ढा रहा है। आज अगर हम कोर्ट-कचहरी जाएं तो हमें क्या दिखाई देता है? मैजिस्ट्रेट ब्राह्मण, बाबू ब्राह्मण, सर्कल इन्सपेक्टर ब्राह्मण, तहसीलदार ब्राह्मण, मुन्सिफ ब्राह्मण, फौजदार ब्राह्मण। ऐसे हालात में हमारे मुकद्मे ऐसे कोर्ट में न्याय मांगने जाएं तो क्या हमें न्याय मिलेगा? बिल्कुल नहीं। कई के निर्णय में मैजिस्ट्रेटों ने कहा है कि महारों की और से गवाह महार ही हैं इसलिए उनका भरोसा नहीं किया जा सकता। लेकिन स्पृश्य जातियों की ओर से स्पृश्य जाति के व्यक्ति की गवाही मैजिस्ट्रेट को चलती है और तो और आज के काँग्रेस प्रमुख भी काँग्रेस वालों की ही मदद करने के लिए तत्पर रहते हैं। ऐसे हालात में मौके के पद हमारे पास आने तक हम पर हो रहे जोर-जुल्म कम नहीं होने वाले। ये पद कसे पाए जा सकते हैं। यह सोचने की बात है। आज स्पृश्य माने गए काँग्रेसियों में चोर और लूटेरों के बीच होती है वैसी दोस्ती है। उनकी दोस्ती में जो शामिल होते हैं वे उनकी तरफ थोड़ी सहानुभूति से देखते हैं। जो लोग उनमें शामिल नहीं होते उनकी तरफ उनका क्रूर रूख कैसा होता है हम सब जानते हैं। इसलिए इस बारे में मैं आपको दो बातें बताना चाहता हूँ। पहली बात यह कि हम सब को संगठन बना कर रहना होगा। हम सभी अस्पृश्य अगर एक हो जाएं तो इस भेदभाव की दीवार में कहीं न कहीं दरार पड़ेगी ही। लोग अज्ञानी हैं। वे न तो पढ़ सकते हैं और न सोच सकते हैं। गांव के जो ताकतवर लोग होते हैं उनके कहे के अनुसार बरतने के लिए वे तैयार होते हैं। डर के कारण लोगों में फूट पड़ने की बड़ी संभावना होती है। इसलिए एकजुट रहना जरूरी है।