141 11.9.1938 लंबे समय तक मेहनत और कोशिश करने से ही सपफलता मिलती है - पुणे - Page 195

174 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

लोगों को एकजुट बनाने के लिए छात्र क्या करने के लिए तैयार हैं? छात्र एकजुटता को कैसे निभाएंगे इस बारे में बड़ी आशंका है। छात्रों को विद्या प्राप्त करने के लिए कड़ी मेहनत करनी चाहिए लेकिन साथ ही उन्हें संगठन बनाने के काम की जिम्मेदारी अंशतः अपने कंधों पर लेनी ही चाहिए। हम सभी की इच्छाएं पूरी करने की सामर्थ्य हम में से किसी के पास नहीं है। लेकिन अपनी निजी इच्छाएं आकांक्षाएं पूरी नहीं हो रही हैं इसलिए तुरंत अलग-थलग रहने से हम अपना ही नुकसान कर रहे हैं। इसलिए इन बातों को नजर के सामने रखते हुए अपने स्वार्थ को परे रख कर संगठन बनाने के लिए मेहनत करें। निजी स्वार्थ से समाज के फायदे को वरीयता दें।

दूसरी बात यह है कि अपने उद्धार के लिए हरिजन सेवक संघ की तरह हजारों संस्थाएं स्थापित हुई हैं। लेकिन उनका अंतिम उद्देश्य क्या है यह समझ नहीं आता। उनका काम कर्त्तव्य करने के इरादे से शुरू है या मुर्गी को दाना डालकर उसे पकड़ना और काटने जैसी स्वार्थपरक बुद्धि है? इन संस्थाओं के लाभ के क्या परिणाम निकलेंगे यह सोचने की बात है इन ब्राह्मणों की संस्थाओं से अगर हमारे छात्र कुछ फायदा उठाते हैं तो डर इस बात का है कि ‘जिसका नमक खाओ उससे बेहमानी ना करो’ के नाते हम अपना स्वत्व भूल जाएंगे। द्रोण और भीष्माचार्य के उदाहरण हमारे सामने हैं ही। पांडवों का पक्ष ‘न्याय का हो न के बावजूद आप उनके खिलाफ क्यों लड़ रहे हैं? यह सवाल जब भीष्म से पूछा गया तो उन्होंने जवाब दिया कि ‘अर्थस्य पुरुषों दासः’

यानी- ‘मैं जिनका भात खाता हूँ उनकी तरफ से मुझे लड़ना पड़ेगा।’ इस जवाब में इंसान के सामान्य स्वभाव का चित्र बना है। इसीलिए स्पृश्य वर्ग द्वारा शुरू की गई संस्थाओं से फायदा उठाने से पहले हमें यह फायदा लेना चाहिए या नहीं यह सोचना जरूरी है। अर्थात् मैं इस बारे में एक बात बताना चाहता हूँ कि- पुराणों में देवों और दानवों के बीच युद्ध हो रहा था। तब दानवों के गुरु शुक्राचार्य के पास संजीवनी विद्या होने के कारण वे मृत सैनिकों को दुबारा जिंदा बनाते थे। लेकिन देवों की तरफ लड़ाई में सैनिकों की संख्या घटने लगी। क्योंकि देवों की ओर किसी के पास संजीवनी विद्या नहीं थी। इसलिए सभी देवों ने साथ मिल-बैठ कर बहुत सोच-विचार के बाद यह निर्णय किया कि देवों के गुरु का पुत्र कच को दानवों के गुरु के पास संजीवनी विद्या सीखने के लिए भेजा जाए। उसके अनुसार कच शुक्राचार्य के पास संजीवनी विद्या सीखने गया। लेकिन देवों की इस कारस्तानी का जब राक्षसों को पता चला तो उन्होंने कच को जान से मार डाला। उसे जला कर उसकी राख शराब में मिलाकर वह शराब शुक्राचार्य को पिलाई। कच ने चतुराई से शुक्राचार्य की बेटी देवयानी के साथ प्रेम संबंध बना कर उसे अपनी तरफ कर लिया था। देवयानी अपने पिता से कच को संजीवनी विद्या सिखाने का हठ लेकर बैठ गई। उसके आग्रह से अगर शुक्राचार्य कच को संजीवनी विद्या सिखा देते हैं तो फिर अपनी बुरी गत होगी सोचकर राक्षसों ने कच को मार डाला। बेटी के हठ