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के आगे मजबूर होकर शुक्राचार्य संजीवनी विद्या के सहारे कच को फिर जिंदा ना बना दें इसलिए कच को जला कर राक्षसों ने उसकी राख शराब में मिला कर शुक्राचार्य को पिला दी ताकि उसे अगर जिंदा करना होगा तो शुक्राचार्य को मरना पड़े। पिता की मृत्यु के बारे में सोचकर देवयानी कोई भयानक हठ नहीं करेगी ऐसा राक्षसों ने सोचा। लेकिन देवयानी को जब इन सभी बातों का पता चला तब उसने अपने पिता से जिद की कि उनके पेट में होने वाले कच को वह संजीवनी विद्या सिखा दें। बेटी का हठ पूरा करने के लिए शुक्राचार्य ने पेट में ही कच को संजीवनी विद्या सिखा दी। फिर मंत्रोच्चार के बाद कच शुक्राचार्य का पेट फाड़ कर बाहर निकला। अपनी विद्या के सहारे उसने शुक्राचार्य को फिर से जीवित किया। देवयानी के साथ शादी करने का वचन उसने दिया था लेकिन अपना काम पूरा होते ही विवाह की बात भुला कर वह तुरंत देवों के गुट में चला गया। कच ने जो किया उसे कई लोग कृतन्घता कहते हैं। लेकिन मैं उसकी करनी को कृतघ्नता नहीं मानता। इसीका अगर हमारे छात्र अनुकरण करें तो मुझे उसमें कुछ बुरा नहीं लगेगा। इस मामले में अंग्रेजी का एक कोटेशन मुझे याद आ रहा है-
‘‘No man can be grateful at the cost of his honour, no woman can be grateful at the
cost of her chastity and no nation can be grateful at the cost of its liberty.’’
आज गांधी जो सत्य और अहिंसा की बात करते हैं उसका मतलब ही मेरी समझ में नहीं आता। सत्य कब और किसे बताएं इसका गांधी ने अब तक कोई जवाब नहीं दिया है। कल्पना कीजिए मेरे पड़ोस में एक अमीर आदमी रहते हैं। वह मेरे मित्र हैं इसलिए वे अपनी थाली कहाँ रखते हैं यह मैं जानता हूँ। इसीलिए अगर चोर आकर मुझसे पूछे कि आपके पड़ोसी ने अपनी दौलत कहाँ छिपाई है बताइए तो सच बता कर मित्रता के साथ धोखा करें या झूठ बता कर मित्र की थाली बचाएं? ऐसे एक नहीं सैंकड़ों उदाहरण दिए जा सकते हैं। खैर!
आखिर मैं आपसे बस इतना ही कहना चाहता हूँ कि आप अगर एकजुट होकर रहोगे तभी कुछ कर पाओगे। हमारे समाज पर हजारों सालों से जो जोर-जुल्म हो रहा है, जो अन्याय होता आया है उसके निवारण की जिम्म्ेदारी आज की पीढ़ी को अपने जिम्मे लेनी चाहिए। हमारे समाज में एकता की बड़ी जरूरत है। एकता के कारण ही हम यह काम कर पाएंगे इसका मुझे यकीन है।
इस बारे में कठोर अनुशासन के पालन से ही कुछ हो सकेगा। अनुशासन के बिना सब ओर कोलाहल फैलेगा और अपने समाज का नाश होगा और विघटन होगा। इसीलिए सबको सुयोग्य एहतियात बरतने चाहिए। संगठन, शील और अनुशासन को बढ़ाएं और उनके सहारे समाज की उन्नति का फायदा कमाएं। इतना कह कर मैं आपसे विदा लेता हूँ।’’ ख्2,
- डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर रांची भाषणेः संपा, मा. फ. गांजरे खंड 1, पृष्ठ 59-67