142 15.9.1938 जनतंत्र की विंडबना है कामगारों को बंधक बनाना - मुंबई - Page 197

176 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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* जनतंत्र की विंडबना है कामगारों को बंधक बनाना

15 सितंबर, 1938 को मुंबई विधानमंडल में काँग्रेस सरकार द्वारा नागरिकों की आ­ जादी के लिए घातक ट्रेड डिस्प्यूट बिल प्रस्तुत किया गया। इस बिल के पहले पठन के अवसर पर डॉ. अम्बेडकर ने तीन घंटों तक जोरदार भाषण किया जिसमें वह सिललिवार कई मुद्दों पर बोले। उन्होंने कहा-

‘‘इस बिल की विभिन्न धाराओं की आलोचना करते समय इसी प्रकार के अन्य बिलों पर भी सोचा जाना जरूरी है जो पहले पास हुए हैं। इस बिल की धाराओं की तुलना पुराने बिल की धाराओं से जब तक नहीं होती तब तक इस बिल की धाराएं स्पष्टता के साथ समझ नहीं आएंगी। इस बिल की आखिरी धारा से लगता है कि 1934 के हड़ताल पर पाबंदी लगाने वाले ट्रेड डिस्प्यूट कांसिलिएशन बिल की कमी को पूरा करने के लिए लाया गया है। 1934 का यह हड़ताल पर पाबंदी लगाने वाला यह कानून ऐसी संस्था की स्थापना के लिए बनाया गया था। जो सुलह करवा दे। 1934 के कानून द्वारा सुलह को ऐच्छिक बनाया गया था लेकिन आज के बिल से सुलह को अनिवार्य बनाया गया है। 1934 वाले कानून में मुख्य रूप से इतना ही बदलाव आने वाला है। 1934 के कानून द्वारा ऐच्छिक रखी गई सुलह को आज अनिवार्य बनाने की जरूरत क्यों आ पड़ी?

1934 की सुलह को आज अनिवार्य बनाने की जरूरत आज सचमुच है या नहीं यह देखने से पूर्व महत्वपूर्ण बातें जानने के लिए हमें उस वक्त के हालात पर नजर डालनी होगी। शुरू में सर रॉबर्ट बेल के बिल में अनिवार्य सुलह की बात ही थी लेकिन 1934 के हालात को देखते हुए सर रॉबर्ट बेल को लगा कि अनिवार्य सुलह की जरूरत नहीं है। इसलिए बिल को पढ़ते समय उन्होंने स्पष्ट किया कि- ‘अनिवार्य सुलह की जगह मैं ऐच्छिक सुलह का प्रावधान ही रखने वाला हूँ।’’ इससे पता चलता है कि 1934 में सर रॉबर्ट बेल को भी अनिवार्य सुलह जरूरी नहीं लगी थी। उस वक्त भी सकलातवाला भी मौजूद थे और उन्हें भी अनिवार्य सुलह जरूरी नहीं लगी थी। इतना ही नहीं, उन्होंने साफ तौर पर बताया कि इस प्रकार के कानून की कोई जरूरत नहीं है।

1934 में अगर अनिवार्य सुलह की जरूरत नहीं थी तो आज हालात में ऐसे क्या बदलाव आए हैं जिनके कारण कानून में बदलाव लाकर सुलह को अनिवार्य बनाना पड़ रहा है? अनिवार्य सुलह का समर्थन करते हुए मुख्यमंत्री द्वारा कुछ हड़तालों के आंकड़े प्रस्तुत करते हुए कहा गया है कि फिलहाल हिंदुस्तान में बार-बार एवं गंभीर हड़ताल हो रहे हैं, इसलिए

* जनता, 1, 8 और 15 अक्तूबर, 1938