142 15.9.1938 जनतंत्र की विंडबना है कामगारों को बंधक बनाना - मुंबई - Page 198

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ऐच्छिक सुलह के बजाय अनिवार्य सुलह का प्रावधान रखने की जरूरत पैदा हुई है। मुख्यमंत्री द्वारा किया गया समर्थन मुझे इसलिए ठीक नहीं लगता क्योंकि मैंने बड़े ध्यान से हड़ताल से संबंधित आंकड़ों का उसमें शामिल होने वाले कामगारों की संख्या तथा बेकार गए कार्यदिवसों की संख्या का अध्ययन किया है। लेबर ऑफिस द्वारा प्रकाशित किए गए लेबर गजेट में मुंबई प्रांत में हुई हड़तालों से संबंधित आंकड़े दिए हैं। उसमें 1921 से 1937 के दौरान हुई हड़तालें, उसमें शामिल कामगारों की संख्या तथा बेकार गए कार्य-दिवसों की संख्या आदि के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है। इन आंकड़ों को देखने से पता चलता है कि साल-दर-साल हड़तालों की संख्या में कमी आ रही है। 1921 में बुंबई प्रांत में कुल 103 हड़तालें हुईं, 1922 में 143 और 1923 में 109 हड़तालें हुईं। लेकिन 1924 से 1927 तक हड़तालों की संख्या 50 हुई। 1928 में 114 हड़तालें हुइंर् और 1929 से 1937 के दरमियान हड़तालों की संख्या 88 से 53 के दरमियान रहीं। दूसरी बात यह कि केवल हड़तालों की संख्या के सहारे उद्योगों में पैदा हुए विक्षुब्ध हालात को नापा नहीं जा सकता। हड़तालों की संख्या भले कम हुई हो लेकिन हड़ताल करने वाले कामगारों की संख्या और बेकार गए कार्य दिवसों की संख्या बड़ी है। कोष्ठकों में दी गई जानकारी से इस बात का पता चलता है। हड़ताल के दिन और कामगारों की संख्या से ही उद्योगों की बीमारी को मापा जाना चाहिए। इस नजरिए से देखें तो 1928 सबसे बुरा साल रहा क्योंकि इस साल बेकार गए कार्य-दिवसों की संख्या 24000,000 थी। दूसरा बुरा साल था 1925। इस साल 11,000,000 कार्य-दिवस बेकार गए। तीसरा बुरा साल था 1929 जिसमें 8000,000 कार्य-दिवस बेकार गए। इसके बाद 1934 से पूर्व हुई हड़तालों में बेकार गए कार्य-दिवसों की संख्या और हड़तालों में शामिल कामगारों की संख्या बहुत नगण्य है। 1934 में हड़ताल विरोधी कानून पारित हुआ। 1934 के बाद बेकार गए कार्य-दिवसों की संख्या तथा हड़ताल में शामिल कामगारों की संख्या पर गौर करें तो किसी भी राजनीतिज्ञ को या सरकारी अधिकारी को यह कहने का मौका ही नहीं मिल सकता कि उद्योग-व्यवसाय की स्थितियां खस्ता थीं। 1934 के बाद केवल 1937 का साल ही बुरा था ऐसा आंकड़ों से पता चलता है और उस वर्ष केवल 897 कार्य-दिवस बेकार गए। उससे पूर्व के साल में बेकार गए कार्य-दिवसों की तुलना में बेहद नगण्य है ऐसा ही करना पड़ेगा। अहमदाबाद शहर में हुई व्यापक हड़ताल 15 दिनों तक जारी रहने के कारण ये कार्य-दिवस बेकार गए थे।

इसके सहारे में एक बात साफ करना चाहता हूँ और वह यह है कि सरकार या मुख्यमंत्री द्वारा ऐसे कोई मुद्दे सामने नहीं रखे गए हैं जिनके सहारे इस सभा को स्पष्ट हो कि सरकार को ऐच्छिक सुलह के बदले अनिवार्य सुलह का प्रावधान रखते हुए 1934 के कानून में आमूलाग्र बदलाव लाने की जरूरत क्यों लगी?

इसके बाद डॉ. अम्बेडकर ने हड़ताल को गैर-कानूनी करार देने वाली कुछ धाराओं की खबर ली। पहले उन्होंने बिल का 62वां अध्याय पढ़कर सुनाया जिसमें हड़ताल को गैर-कानूनी ठहराया गया था।