142 15.9.1938 जनतंत्र की विंडबना है कामगारों को बंधक बनाना - मुंबई - Page 199

178 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

‘‘यह दर्शाने के लिए कि ये धाराएं न्यायपूर्ण हैं बताया गया कि किसी को भी ‘हड़ताल करने’ का हक नहीं होगा। चूंकि कामगारों को हड़ताल पर जाने का अधिकार नहीं है, हड़ताल करने पर उन्हें सजा देना नैतिकता अथवा कानून के खिलाफ नहीं।’’ मैं अपने भाषण में इसका खंडन करना चाहता हूँ।

पहले हम ‘हड़ताल’ शब्द का अर्थ समझें। ‘हड़ताल’ शब्द को नौकरी का अनुबंध तोड़ना’ समझा जाता है। कामगार हड़ताल पर जाते हैं तब वे नौकरी का अनुबंध भंग करने के अलावा और कुछ नहीं करते। नौकरी का अनुबंध तोड़ने के अपराध के लिए हिंदुस्तान के कानून में जेल की कोठरी की सजा बताई गई है। पहले देखें कि क्या हिन्दी कानून यह मानता है कि कामगारों को भी हड़ताल करने का अधिकार है? अगर हिन्दी इस बात को मानता हो तो वह यह बात किस प्रकार करता है? हड़ताल के लिए अगर कानून सजा देता हो तो वह किस प्रकार सजा देता है? मैं आपके सामने बिल्कुल प्राथमिक कल्पना रखता हूँ। कोई करतूत दीवानी अपराध हो सकती है या फौजदारी अपराध। सवाल यह है कि नौकरी का अनुबंध तोड़ना क्या फौजदारी अपराधों के तहत गिना जाएगा? जाहिर है कि नहीं गिना जा सकेगा। ‘नौकरी के अनुबंध’ को तोड़ना दीवानी तरह का अपराध ही माना जाएगा। सो, नौकरी का अनुबंध तोड़ना अगर दीवानी मामला हो तो जिस व्यक्ति को इसके कारण नुकसान पहुंचता है उसे कानूनन केवल नुकसान की प्रतिपूर्ति मिलेगी अलग और कुछ नहीं मिलेगा।

नौकरी का अनुबंध तोड़ने को अगर फौजदारी अपराध माना जाए तो ऐसे अपराध के लिए हिंदी कानून में सजा का क्या प्रावधान है यह देखना होगा। हिन्दी कानून में इसे किस तरह का अपराध माना जाता है। यह ठीक से समझने-जानने के लिए हम इतिहास का रुख करते हैं। नौकरी के अनुबंध को तोड़ने के सिलसिले में सबसे पहला कानून 1859 में बना था। उसे नाम दिया गया था- ब्रीच ऑफ कॉन्ट्रैक्ट एक्ट इंडियन पीनल कोड (भारतीय दंड विधान) की 480, 491 और 492 धाराएं नौकरी का अनुबंध न तोड़ा जाए इसलिए हैं। 1859 में पारित कानून कवेल कारीगरों पर ही लागू था। उस वक्त के हालात में अंग्रेजी सरकार को उसे कानून की जरूरत महसूस हुई। उस दौरान अंग्रेज साम्राज्यशाही के सामने विद्रोह का बड़ा मसला मुंह बाए खड़ा था। सेना के लिए जरूरी सामान की आपूर्ति कराने के लिए कारीगरों को पहले ही पैसे दिए गए थे। लेकिन कारीगर डर या अन्य किसी कारण से भुगतान लेने के बावजूद अपने गांव निकल गए थे। ऐसी स्थितियों में यह कानून बनाया गया था। लेकिन भले कानून बनाया गया हो, भले इस कानून के तहत नौकरी का अनुबंध तोड़ना अपराध करार दिया गया था इस कानून पर बहुत कम बार अमल किया जाता था। लोगों को सजा देनेवाला यह कानून नहीं था। इस कानून का बाद का इतिहास भी काफी मनोरंजक है। इस कानून को कभी भी इस्तेमाल में नहीं लाया जाता था। 1920 में उसमें सुधार किया गया। इस सुधार के तहत इसमें दो बातें तोड़ी गईं।