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पहली नौकरी का अनुबंध तोड़ने के लिए सजा सुनाने से पहले मेजिस्ट्रेट इस बात पर गौर करे कि मालिक-नौकरी के बीच किया गया अनुबंध योग्य था या नहीं। मैजिस्ट्रेट को अगर लगे कि करार अयोग्य था तो कारीगर द्वारा मालिक से पहले ही भुगतान लिए जाने के बावजूद उसे सजा ना दें। दूसरी नौकरी के बारे में झूठी शिकायतें करने वाले मालिक को सजा देने का अधिकार मैजिस्ट्रेट को इस कानून के जरिए मिला।
इंडियन पीनल कोड की 400वीं धारा ‘यात्रा के दौरान नौकरी के अनुबंध’ को भंग करने के अपराध को लेकर है। यह कानून सभी नौकरी के अनुबंधों पर लागू नहीं है। मालिक के साथ यात्रा करते हुए अगर कोई नौकर नौकरी का अनुबंध तोड़ता है तो उस नौकर को इस कानून के तहत दंडित किया जा सकता है। इंडियन पीनल कोड की धारा 491 के अनुसार किसी असहाय इंसान की मदद के लिए नौकरी पर रखे गए किसी नौकर द्वारा अगर नौकरी का अनुबंध तोड़ा जाता है तो उसे सजा दी जा सकती है। किसी नौकर को मालिक अपने
खर्च से दूर देश में काम पर भेजे और वहां अगर नौकर द्वारा नौकरी के अनुबंध को तोड़ा जाए तो उस नौकर को उसके इस गुनाह के लिए इंडियन पीनल कोड के 492वीं धारा के अनुसार सजा दी जा सकती है। लेकिन केन्द्रीय विधिमंडल ने 1925 में 490 और 492 की धाराएं रद्द कर दीं। अब इन धाराओं का इस्तेमाल नहीं किया जाता। इन धाराओं के कारण जिन कृत्यों को पहले अपराध की श्रेणी में गिना जाता था उन्हें अब अपराधों की श्रेणी में नहीं गिना जाता। इस प्रकार, ‘‘नौकरी के अनुबंध को तोड़ने’’ को फौजदारी अपराध मानकर उसे कानून की किसी धारा के तहत अगर सजा दी जा सकती है तो वह केवल इंडियन पीनल कोड की धारा 491 के तहत। असहाय इंसान को किसी तरह कोई असुविधा न हो केवल इसीलिए इस धारा को जारी रखा गया है, इसके पीछे कोई और उद्देश्य नहीं है।
सो, इस विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि ‘नौकरी का अनुबंध तोड़ना’ फौजदारी अपराध नहीं है और सजा देनी ही हो तो उसे केवल हिंदी कानून की धारा 491 के तहत ही सजा दी जा सकती है, किसी अन्य तरह से नहीं। यह केवल दीवानी तरह का अपराध है। और इसके एवज में मालिकों को केवल क्षतिपूर्ति ही मिलेगी, अन्य कुछ नहीं। हिंदी कानून द्वारा नौकरी के करार को तोड़ना गुनाह नहीं मानते हुए दीवानी अपराध हो माना है। इसका कारण है- नौकरी के अनुबंध को तोड़ने को फौजदारी अपराध मानना यानी किसी को उसकी मर्जी के खिलाफ नौकरी करने पर मजबूर करना है और किसी को उसकी मर्जी के खिलाफ चाकरी करने पर मजबूर करना यानि उसे गुलाम बनाना है। हिंदी विधिमंडल की यही राय है। गुलामी यानी क्या? यूनाइटेड स्टेट्स के संविधान में गुलामी की व्याख्या इस प्रकार की गई है- ‘‘गुलामी यानी जबरन, मर्जी के खिलाफ किसी को नौकरी करनी पड़े।’’ मेरी राय है कि हड़ताल के लिए कामगारों को सजा देना यानी उन्हें गुलाम मानना। हड़ताल को गैर-कानूनी करार देना यानी कामगारों से उनकी मर्जी के खिलाफ काम लेना। किसी को उसकी मर्जी के खिलाफ काम करने पर मजबूर करना उसे गुलाम बनाना ही है।