182 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
के लिए कामगारों को केवल दो महीनों का ही समय दिया गया है। सुलह के लिए रखा गया लंबा समय व्यर्थ बीत जाने के बाद इस दौरान असंगठित और तितर-बितर हो चुके कामगारों के प्रत्यक्ष विरोध की तैयारी दोबारा करने के लिए दो महीनों की सीमित अवधि काफी है, क्या सरकार की यही सोच है?
हड़ताल के लिए कामगारों का संगठन करते हुए कामगार नेताओं को किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है यह मैं इसलिए नहीं जानता क्योंकि मैंने यह काम कभी किया नहीं है। लेकिन मुंबई शहर के कामगार आंदोलनों का मैंने जो अध्ययन किया है उसके आधार से मैं यह जरूर कह सकता हूं कि चार महीनों तक कामगारों को बंद रखने के बाद हड़ताल की तैयारी के लिए उन्हें फिर संगठित करने के लिए दो महीनों का समय बहुत कम है। दो महीनों की समयावधि में अगर कामगार हड़ताल की घोषणा नहीं करते तो उनका हाल बेहद अजीब होने वाला है। क्योंकि हड़ताल न करने की स्थिति मं जो शर्तें उन्हें मंजूर नहीं थी उन्हें मान लेने जैसा होगा। दो महीनों के बाद अगर कामगार हड़ताल पुकारते हैं और दोबारा अपनी मांगे पेश करते हैं तो उन्हें एक बार फिर इसी क्रम से गुजरते हुए चार महीने पच्चीस दिनों तक के समय तक बातचीत के निष्कर्ष का इंजतार करते रहना पड़ेगा। इंतजार कीजिए और चार महीने पच्चीस दिनों तक चलने वाली सुलह की बातचीत के परिणामों का इंजतार कीजिए। परिणाम ठीक ना निकलें तो दो महीनों के भीतर-भीतर हड़ताल कीजिए। अगर नई शिकायतें हों तो उनके लिए फिर चार महीने पच्चीस दिनों का चक्कर चलता ही रहेगा। सुलह की बातचीत वाला इस प्रकार का कालचक्र कामगारों को हमेशा की गुलामी में नहीं धकेलेगा, ऐसा कोई कह सकता है? और, अगर आप सोचते हैं कि यह बिल कामगारों को गुलामी की गर्त में ढकेलने के लिए नाकामी है तो और कौन-सा काला कानून है जो उन पर गुलामी लादेगा यह जानना भी मनोरंजक है।
इस बिल की हड़ताल से संबंधित धाराओं के बारे में इतना विश्लेषण काफी है ऐसा मुझे लगता है।
अब मुझे लगता है कि इस बिल के तथा 1929 के ट्रेड डिस्प्यूट एक्ट की हड़ताल से संबंधित धाराओं की तुलना करना आवश्यक और उपयुक्त होगा। 1929 के कानून द्वारा भी कामगारों के हड़ताल करने के अधिकारों पर कुछ पाबंदियां लागू की गई हैं। इसलिए, इन दो कानूनों की धाराओं की तुलना में हमें बताएगी कि क्या हम आजादी की राह पर आगे बढ़ रहे हैं या गुलामी और दासता की दिशा में रेंगते हुए बढ़े जा रहे हैं। यह जानना हमारे लिए बोधप्रद होगा। एसेंक्ली के सदस्यों को भी पता चलेगा कि वे किस मोड़ पर खड़े हैं।
1929 के कानून की एक धारा के अनुसार राजनीतिक मसलों के कारण की जानेवाली सार्वजनिक हड़तालें गैर-कानूनी करार दिए गए हैं। एक और धारा के तहत बिना नोटिस दिए की गई हड़ताल को गैर-कानूनी करार दिया है। बिना नोटिस दिए पुकारी गई हड़ताल