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के मुद्दे पर 1929 के कानून और आज के बिल में समानता दिखाई देती है। लेकिन केवल इस एक बात के अलावा ये दोनों बिल एक-दूसरे से एकदम अलग हैं। आज का बिल बेहद प्रतिगामी ढंग का है तथा इस बिल को बनाने वाला 1929 के बिल के निर्माता से भी बेहद प्रतिगामी मानसिकता वाला इंसान है ऐसा कहा जा सकता है।
1929 के कानून की धारा केवल लोगों के उपयोगी (Public Utility) व्यवसायों पर ही लागू की गई थी। उस कानून के सहारे केवल पब्लिक युटिलिटीज में होने वाली हड़तालों को ही गैर-कानूनी ठहराया था। लेकिन आज का कानून सभी व्यवसायों की हड़तालों को गैर-कानूनी करार दे रहा है। मेरी राय में इन दो कानूनों के बीच का यह अत्यंत महत्वपूर्ण फर्क है। क्या इस तरह का फर्क आज लागू करना न्यायपूर्ण रहेगा?
1929 में सेंट्रल एसेंब्ली में काँग्रेस द्वारा इस कानून के बारे में कौन-सी नीति अपनाई गई थी यह जानना योग्य रहेगा।
इसके बाद डॉ. अम्बेडकर ने उस वक्त की सिलेक्ट कमेटी की रिपोर्ट इस काँग्रेस पार्टी के सदस्यों द्वारा लिखा हुआ हिस्सा पढ़ कर सुनाया। तब स्पष्ट हुआ कि तब काँग्रेस द्वारा हड़ताल को गैर-कानूनी करार दिए जाने के 1929 के कानून के हिस्से का विरोध किया था। उन्होंने पब्लिक युटिलिटिज को परिभाषित करने का आग्रह किया था। उस वक्त सरकार पब्लिक युटिलिटीज को परिभाषित करने के प्रति नाखुश थी। तो काँग्रेस का कहना था कि नौकरशाहों की मनमानी पर फैसला छोड़ने के बजाय ‘पब्लिक युटिलीटीज’ की स्पष्ट परिभाषा बनाना चाहिए। साथ ही, काँग्रेस की दलील थी कि ‘पब्लिक युटिलीटीज’ की सीमा में कई उद्योग आ सकते हैं और नौकरशाही अपने उद्देश्यों की पूर्तता के लिए किसी भी उद्योग की हड़ताल को ‘पब्लिक युटिलीटिज’ के बहाने गैर-कानूनी करार दे सकती है। इसीलिए काँग्रेस पार्टी का कहना था कि यह कानून केवल ‘सोशल सिक्योरिटी सर्विसेस’ तक ही सीमित किया जाए। लेकिन आज, वही काँग्रेस सत्ता हाथ में आने के बाद वही कानून सभी उद्योगों पर केसे लागू कर रही है यह डॉ. अम्बेडकर ने स्पष्ट किया।
जिन व्यवसाय-उद्योगों पर समाज का जीवन निर्भर करता है केवल उन्हीं व्यवसाय-उद्योगों में होने वाली बिना नोटिस की हड़तालों को गैर-कानूनी ठहराया जाए ऐसा उस वक्त काँग्रेस का कहना था। लेकिन आज के बिल के जरिए हर उद्योग में की जाने वाली हड़ताल को गैर-कानूनी ठहराया जा रहा है।
मान लीजिए, कल हिंदी महिलाओं में होठों को रंगने की फैशन ने जोर पकड़ा। तब किसी कारखाने के मालिक द्वारा लिपस्टिक बनाने का कारखाना खोला। उस कारखाने के कामगार अगर बिना नोटिस दिए हड़ताल पर चले गए तो उनकी हड़ताल गैर-कानूनी मानी जाएगी। कोई यह तो नहीं कह सकेगा कि महिलाओं के होठों को रंगने के सुख में व्यवधान आएगा इसीलिए लिपस्टिक बनाने के कारखाने को लोगों के जीवन के लिए