142 15.9.1938 जनतंत्र की विंडबना है कामगारों को बंधक बनाना - मुंबई - Page 205

184 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

उपयोगी मानते हुए हड़ताल करने वाले कामगारों के हकों पर नियंत्रण रखें।

‘सोशल सर्विस सेक्युरिटीज’ तक ही कामगारों के हड़ताल करने के हकों पर नियंत्रण रखने की अपनी 1929 की नीति आज लगता है काँग्रेस ने बदल ली है। इतना ही नहीं, अब की बार काँग्रेस ने 1929 के कानून से भी आगे बढ़कर नौकरशाही को तक मात दी है।

पुरानी नौकरशाही ने अकलमंदी दिखाते हुए, अपनी जिम्मेदारी को पहचान कर तथा हड़ताल करना कामगारों के हकों में शुमार है यह जानते हुए लोकोपयोगी उद्योगों के हड़तालों को ही गैर-कानूनी ठहराया। लेकिन आज की सरकार अपनी इतनी जिम्मेदारी भी नहीं निभा सकी। काँग्रेस के इस बिल के कारण लिपस्टिक के कारखाने में होने वाली हड़ताल को भी गैर-कानूनी ठहराया जाने वाला है।

और यह सब किसलिए, इस पूछताछ और लेन-देन की बातचीत से कामगारों को क्या मिलेगा? मैं तो इतना ही समझ पाया हूं कि इस बिल के अनुसार सुलह की बातचीत के लिए जिन चार महानुभावों को नियुक्त किया जाएगा उनका मुंह............. चार महीने और पच्चीस दिनों तक ताकते रहने के अलावा कामगारों को कुछ नहीं मिलने वाला। उसके बजाय काँग्रेस सरकार खुलेआम सीधे-सीधे यह कह देती कि ‘‘भले तुम मानो या ना मानो, हम जबरदस्ती आप पर सुलह लादेंगे।’’ ताकि कम से कम यह सुनिश्चित रूप से माना जा सकता कि सुलह की बातचीत के बाद कुछ न कुछ हाथ लगेगा।

इस बिल के कारण कामगारों को पहले रजिस्ट्रार, कंसलिएटर, कंसलिएटर्स बोर्ड आदि सीढि़यों से गुजरना पड़ेगा। इस पूरी कवायद से लोगों को और भूख से पीडि़त मजदूरों को बस मीठे-मीठे स्वरों में झूठ परोसने वाले और सुलह करवाने की कहने वाले व्यक्ति के आगे अपनी मांगों को रखने के अलावा और कुछ होगा ऐसा नहीं लगता। इन विभिन्न सीढि़यों से कोई ठोस परिणाम निकलना संभव नहीं। हड़ताल करने निकले मजदूरों को शांत करने का यह इलाज हो ही नहीं सकता। कामगारों के नजरिए से होगा इतना ही कि चार महीने पच्चीस दिनों के अंतराल के बारे में सोच कर कामगारों के संगठन सोच में पड़ेंगे और कामगार हड़ताल में असमर्थ रहेंगे।

1934 के कानून में आर आज के बिल में जो एक महत्वपूर्ण फर्क है उसकी ओर आज मैं आपका ध्यान दिलाना चाहता हूं। 1934 के कानून पर जब वाद-विवाद चल रहा था तब सूचना रखी गई थी कि सुलह के दौरान हड़ताल पर पाबंदी लगाई जाए। हड़ताल पर अगर प्रतिबंध नहीं लगाया जाए तो कम से कम पिकेटिंग पर प्रतिबंध लगे। लेकिन आनरेबल सर रॉबर्ट बेल ने इन दोनों सूचनाओं का मान्यता नहीं दी।

उस दौरान एक सदस्य द्वारा डॉ. अम्बेडकर के इस कथन पर आपत्ति जताई इसलिए डॉ. अम्बडकर ने डॉ. रॉबर्ट बेल के उस समय के भाषण में से एक परिच्छेद पढ़कर सुनाया।