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मेरी पक्की राय यह है कि सुलह की बातचीत के दौरान कामगारों की हड़ताल पर अगर पाबंदी नहीं हो तो ही सुलह की बातचीत सफल होना संभव होता है। अपनी सामर्थ्य जुटाने के लिए मालिकों के पास जब चार महीने पच्चीस दिनों का समय होता है। इस दरमियान कामगार न तो हड़ताल की तैयारी के रूप में कोई संगठन बना सकते हैं और बातचीत असफल रहने के बाद दो महीनों के अंदर ही वे हड़ताल कर सकते हैं। ये सभी बातें पता होने के बाद मालिक भी सुलह सफल कराने की क्यों सोचेंगे? सुलह की कामगारों की कोई शर्तें स्वीकारने पर मजबूर करने वाला दबाव मालिकों पर नहीं है। हड़ताल के दबाव के बगैर मालिक कभी भी किसी सुलह के लिए तैयार नहीं होते।
इस बिल को ले आने वालों की अगर सचमुच यह इच्छा होती कि वे जिस व्यवस्था को लागू करने जा रहे हैं उससे मालिक और कामगारों का फायदा हो तो वे रॉबर्ट बेल की नीति को अपना कर सुलह की बातचीत चलने के दौरान कामगारों पर हड़ताल की पाबंदी नहीं लगाते। लेकिन पुरानी नौकरशाही द्वारा भी माना गया तथ्य आज की काँग्रेस की ‘लोकप्रिय’ और अपने को ‘मजदूरों के प्रतिनिधि कहलाने वाली सरकार ठुकरा रही है। क्या काँग्रेस इसी तरह के जनतंत्र की स्थापना करने जा रही है? आपको यह जनतंत्र लगता होगा, मुझे लेकिन ऐसा नहीं लगता। कामगारों के बुनियादी हकों को जहाँ कुचला जाता हो वह जनतंत्र ही नहीं है।
जिस जनतंत्र में जिंदा रहने के साधन भी जिनके हाथ में नहीं होते उस संगठन की नजर में बिखरे हुए अशिक्षित और बुद्धिहीन कामगारों पर इस प्रकार गुलामी के बंधन लादे जाते हैं वह जनतंत्र है ही नहीं। वह जनतंत्र की विडंबना है।
इसके बाद डॉ. अम्बेडकर ने बिल की यूनियन संबंधी धाराओं की बखिया उधेड़ी। उन्होंने कहा, इन धाराओं ने कामगारों की युनियन्स को क्वालिफाइड यूनिशन्स, रजिस्टर्ड रिप्रेजेंटेटिव यूनियन्स आदि विभिन्न प्रकारों में बांटा है। विभिन्न प्रकार की यूनियन्स किन शर्तों पर तथा किस प्रकार रजिस्टर करें और ये पंजीकृत यूनियन्स किन शर्तों पर रिप्रेजेंटेटिव यूनियन्स बनाएं, पंजीकृत यूनियन का प्रतिनिधित्व किन तत्वों के आधार पर रद्द करें आदि बातें इस धारा में तय की गई हैं। आगे डॉ. अम्बेडकर ने कहा-
अनिवार्य सुलह और लेन-देन संबंधी बातचीत के दौरान हड़ताल पर पाबंदी लगाने वाली धाराओं के साथ इन धाराओं का संबंध कैसे हो सकता है यह मेरी समझ में नहीं आ रहा है। लगता है कि जानबूझकर इन धाराओं को इस बिल में जोड़ा गया है। नाम के सहारे इस बिल का उद्देश्य बताते हुए कहा गया है कि, ‘‘उद्योगों में हुए टंटों को शांतिपूर्ण ढंग से और सुलह के साथ मिटाने के लिए तथा कुछ अन्य कारणों के लिए लाया गया बिल।’ इसमें जिनका जिक्र हुआ है वे दूसरे कारण कौन-से हैं? इन दूसरे कारणों का जिक्र बिल के नाम में क्यों नहीं किया गया है? उसमें कुछ लज्जास्पद है