186 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
क्या? इन दो हिस्सों का बिल में जो संबंध है उसे स्पष्ट किया जाना जरूरी है। अगर इन दोनों में कोई संबंध है उसे स्पष्ट किया जाना जरूरी है। अगर इन दोनों में कोई संबंध नहीं हो तो दूसरे हिस्से की धाराओं को हटाना चाहिए।
बहुत सोचने के बाद मुझे पता चला कि इन दो हिस्सों का एक-दूसरे से महत्वपूर्ण संबंध है। बिल की 75वीं धारा से यह संबंध स्पष्ट हो सकता है। इस धारा के अनुसार कामगारों के प्रतिनिधियों के अलावा अन्य कोई भी इस कानून के मुताबिक सुलह की लेन-देन संबंधी बातचीत में शामिल नहीं हो सकता। यह अत्यंत महत्वपूर्ण धारा है क्यांकि हिंदी ट्रेड आंदोलन के लिए यह बेहद विघातक साबित होने वाली है।
कामगारों क प्रतिनिधि कौन हो सकते हैं और बातचीत में कामगारों के प्रतिनिधि के तौर पर कौन शामिल हो सकते हैं इन बातों का फैसला इन धाराओं में किया गया है। कामगार प्रतिनिधि की जो व्याख्या इस बिल में दी गई है इसमें न बैठने वाला कोई भी व्यक्ति कामगारों के प्रतिनिधि के तौर पर बातचीत में हिस्सा नहीं ले सकता। वह कामगार भले वास्तव में सच्चा और लायक प्रतिनिधि क्यों न हो, भले वह कामगार आंदोलन का अनुभव प्राप्त नेता क्यों न हो इस व्याख्या में अगर वह नहीं बैठता तो सुलह संबंधी बातचीत में कामगारों के प्रतिनिधि के तौर पर वह शामिल नहीं हो सकता।
दो तरह की यूनियन्स को कामगारों के प्रतिनिधि कहलाने के लिए योग्य माना गया है। कुल कामगारों के 20 प्रतिशत कामगार जिनके सभासद हो और मालिकों की मान्यता प्राप्त यूनियन्स आती हैं। दूसरे तरह की यूनियन्स में सदस्य कामगारों की संख्या कुल कामगारों की संख्या में से 50 प्रतिशत की होगी। इन दोनों तरह की यूनियन्स प्रातिनिधिक यूनियन्स (Represenative Unions) के तौर पर ही मानी जाएंगी। लेकिन एक-दूसरे के खिलाफ दो यूनियन्स को एक ही नाम के तहत कैसे रखा जा सकता है? मेरी राय में इन दो तरह की यूनियन्स को गुलाम यूनियन्स और आजाद यूनियन्स कहना सही होगा। जिस यूनियन का कानूनी अस्तित्व, प्रतिनिधित्व के अधिकार और मताधिकार आदि सब मालिकों की मर्जी पर निर्भर होगा उन्हें गुलाम यूनियन्स कहना मेरी राय में अत्युक्ति नहीं होगी। ऐसी यूनियन्स को ‘मालिकों से मान्यताप्राप्त’ कहने के बजाय ‘मालिकों की पसंदीदा’ यूनियन्स कहना ज्यादा सटीक होता है, जिससे कि इन यूनियनों का गुलामों-सा स्वरूप स्पष्ट होता।
यूनियन को प्रतिनिधित्व देने से पूर्व उसके पंजीकृत होने की शर्त रखने के पीछे क्या उद्देश्य है यह समझ में नहीं आता। इस बिल द्वारा 1926 में पारित हुए केन्द्र सरकार के ट्रेड यूनियन्स एक्ट को खारिज नहीं किया है। इस बिल ने उस कानून को जारी ही माना है। किसी भी यूनियन का इस बिल के तहत पंजीकृत होने से पूर्व पुराने कानून के तहत पंजीकृत होना जरूरी क्यों माना गया है? इस कारण हर यूनियन दो बार पंजीकृत करनी पड़ेगी। पहले 1926 के कानून के तहत और फिर इस नए बिल के तहत इस