142 15.9.1938 जनतंत्र की विंडबना है कामगारों को बंधक बनाना - मुंबई - Page 208

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प्रकार दो बार यूनियन को पंजीकृत करना होगा।

1926 के कानून के तहत पंजीकृत यूनियन को क्या फायदे मिलते हैं यह पहले देखना होगा। इससे पता चलेगा कि नया बिल ट्रेड यूनियनों को कौन-सी नई रियायतें दे रहा है या पुरानी रियायतें वापिस ले रहा है। 1926 कानून के अनुसार पंजीकृत की गई यूनियन एक ऐसी संस्था बनती है जिसके बारे में शिकायत दर्ज की जा सके और खुद भी शिकायत दर्ज कर सके। संस्था होने के नाते अपने सदस्यों के प्रतिनिधित्व का अधिकार उसे प्राप्त होता है। 1926 के कानून के तहत पंजीकृत यूनियन को अगर कामगारों का प्रतिनिधि कहलाने का अधिकार अगर मिलता है तो आज के इस बिल के जरिए उसे एक बार फिर पंजीकृत करने की क्या जरूरत है? इस बिल के कारण एक और विलक्षण बात होने जा रही है। 1926 के कानून के तहत पंजीकृत यूनियन इस बिल के अनुसार पंचायत (लवाद मंडल) के आगे कामगारों के प्रतिनिधि के रूप में खड़ी नहीं रह सकती। एक और बात है जो नियमों के खिलाफ है जो मैं आपके सामने लाना चाहता हूं और वह यह है कि 1926 के कानून के तहत पंजीकृत यूनियन्स विधानमंडल में मजदूरों के प्रतिनिधि के तौर पर जा सकती हैं लेकिन वे पंचायत के सामने उनका प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते।

उन्हें इस प्रकार प्रतिबंधित क्यों किया गया है? 1926 के कानून के तहत पंजीकृत हुई यूनियन्स से उनका एक महत्वपूर्ण अधिकार उनसे छीना गया है ऐसा मुझे लगता है।

1934 के कानून में तय किया गया कि सुलह की बातचीत में कामगारों के प्रतिनिधि शरीक होंगे। कामगारों के प्रतिनिधित्व का अधिकार उन यूनियन्स को दिया गया जो 1926 के कानून के तहत पंजीकृत हुई थीं। 1926 के कानून के तहत पंजीकृत यूनियन्स संगठित संस्था होने के कारण 1934 के कानून के अंतर्गत उसके प्रतिनिधित्व के अधिकार को मंजूरी मिली थी। 1935 के कानून से ट्रेड यूनियन्स को विधिमंडल में अपने सदस्य भेजने के अधिकार प्राप्त हुए। 1934 के मुंबई विधिमंडल द्वारा पारित किए गए कानून से पंचों के आगे अपने प्रतिनिधियों को भेजने के ट्रेड यूनियन के अधिकार को मान्यता दी गई। मैं आपको स्पष्ट कर बताऊंगा कि अब यह अधिकार यूनियन्स के पास है लेकिन इस बिल के तहत के अधिकार यूनियन्स से लेकर केवल गुलाम यूनियन्स को ही दिया जाने वाला था। इस बिल के तहत पंजीकृत यूनियन्स 1926 के कानून के तहत पंजीकृत होना जरूरी है यह शायद इसी कारण तय किया गया हो ऐसा मुझे लगता है ताकि इन यूनियन्स को पंचों के सामने अपने प्रतिनिधि भेजने के साथ-साथ विधिमंडल में सदस्य बनाने का अधिकार भी प्राप्त हो। इस तरह की नीति ट्रेड यूनियनों के लिए घातक साबित होगी। मेरी राय में यकीनन ये सभी शर्तें गुलाम यूनियन्स के फायदे के लिए हैं।

काँग्रेस के मंत्रियों की अगर यह राय है कि ट्रेड यूनियन्स हमेशा मालिकों की मर्जी पर निर्भर रहें तो इस बारे में उनसे वाद-विवाद करने की मेरी बिल्कुल इच्छा नहीं है। काँग्रेस अगर गुलाम इंसान को ही आजाद इंसान मानना चाहती है तो यह उनकी मर्जी है।