188 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जिस प्रकार यह बिल हड़ताल पर प्रतिबंध लगा कर कामगारों को बांध देने वाला है उसी प्रकार काँग्रेस की अगर यह राय है कि गुलाम यूनियन्स के जरिए ही कामगारों को जोड़ा जाए तो उनके साथ कौन सोच-विचार कर पाएगा? इस तरह की सोच मुझे मंजूर नहीं। जिस शांति को स्वीकारने के लिए यह बिल लाया गया है वैसी शांति हमें नहीं चाहिए। जो शांति श्रमजीवियों को नुकसान पहुंचाने वाली हो हम उसका निषेध करते हैं।
जिसका पेट पूरा भरा है उसके लिए यह शांति ठीक है। भूख से परेशान श्रमजीवि वर्ग के हित में वह नहीं है। हो सकता है यह बात सच हो कि हिंदुस्तान में ट्रेड यूनियन के आंदोलन ने अभी जोर नहीं पकड़ा है। कुछ लोग ट्रेड यूनियन्स को घातक करार देने की कोशिश में भी हो सकते हैं। लेकिन मुझे इस बात से आश्चर्य महसूस हो रहा है कि जो कभी काँग्रेस के सदस्य थे और जिन्हें काँग्रेस के अहिंसा आदि तत्व मंजूर थे वे कम्युनिस्टादि नेता भी आज काँग्रेस को मजदूरों के हितों के संदर्भ में घातक सिद्ध होंगे ऐसा लग रहा है।
कुछ समय बाद गुलाम यूनियन्स आजाद बन सकती हैं यह अगर सरकार साबित कर दे तो मैं अपनी सोच बदलूंगा। लेकिन मुझे लगता है कि गुलाम यूनियन्स कभी भी स्वतंत्र नहीं होंगी। क्योंकि स्वतंत्र यूनियन्स पर लादी गई शर्तें लगभग असंभव हैं। उन्हें कभी पूरा नहीं किया जा सकता। किसी भी यूनियन की आजादी के लिए कुल कामगारों में से 50.1 प्रतिशत कामगारों का उसका सदस्य होना जरूरी है। क्या यह शर्त सही है? मजदूर अगर मालिकों की मंजूरी की गुलामी को त्याग कर स्वतंत्र बनना चाहते हों तो उनमें से 50 प्रतिशत कामगारों का ट्रेड यूनियन के सदस्य होना जरूरी है। क्या यह शर्तें पूरी कर पाना संभव है?
काँग्रेस के मंत्री महोदय ने हमसे अहमदाबाद की नमूनेदार स्थितियों की ओर ध्यान देने के लिए कहा है। अहमदाबाद की स्थितियां आपके सामने रखते हुए सरकार ने आपको सलाह दी है कि आप उसी प्रकार बरतें। मुझे यह सब मंजूर है। लेकिन यह पूछना चाहता हूं कि इस बिल के जरिए क्या ‘अहमदाबाद मजूर महाजन’ संस्था भी पृथक यूनियन बन सकती है? वह कामगारों की अलग यूनियन बन पाएगी ऐसा मुझे नहीं लगता। कुछ मुसलमानों का अपवाद अगर छोड़ दें तो पूरे अहमदाबाद में सभी मिल मालिक और कामगार एक ही धर्म के हैं और वे एक ही भाषा बोलते हैं। इससे मालिक और कामगारों के बीच का वितंडा थोड़ा कम होता है। साथ ही, गुजरात महात्मा गांधी का निवास-स्थान है इसलिए वे उनके सामने भी अपनी शिकायतें रख सकते हैं। वे जब फैसला सुनाते हैं तो दोनों पक्षों को चुपचाप उसे स्वीकारना पड़ता है। ऐसी स्थितियों में ‘मजूर महाजन’ यूनियनें बढ़ी हैं। करीब 20 सालों से वह टिकी हैं वह किसी ने बताया। मेरे पास 1938 का एक लेबर गैजेट है। उससे पता चलता है कि अहमदाबाद की कपास की मिलों में कुल 90,000 कामगार काम कर रहे हैं। इन 90,000 में से कितने यूनियन के सदस्य हैं? ‘मजूर महाजन’ संस्था पांच यूनियन्स मिलाकर बनी है। इस संयुक्त यूनियन