189
में कुल 22000 कामगार हैं। यानी कुल कामगारों में से केवल 29 प्रतिशत कामगार ही इस यूनियन के सदस्य हैं। इसके बावजूद, ‘अहमदाबाद मजूर महाजन’ संस्था क्या मालिकों की सहमति के बिना इस बिल के तहत पंजीकरण के लिए योग्य मानी जाएगी?
अमदाबाद जैसे शहर की सभी तरह से अनुकूल स्थितियों में होने वाली ‘मजूर महाजन’ यूनियन भी आजाद यूनियन नहीं बन सकती क्योंकि पंजीकरण के लिए उसे भी मालिक की सहमति पर ही निर्भर करना पड़ेगा।
इसीलिए इस बिल द्वारा रखी गई शर्त पूरी करना असंभव है। उद्योगों के क्षेत्र में अगड़े इंग्लैंड में भी मुझे लगता है कि इस शर्त पर खरा उतरना असंभव होगा। मि वाल्टर की किताब से पता चलता है कि इंग्लैंड में कुल 18,000,000 कामगार हैं। उनमें से 5,531,000 कामगार यूनियन्स के सदस्य हैं। जिन देशों के कामगार संगठित हैं और जहां उद्योग-व्यवसायों में बहुत अधिक वृद्धि हुई है उस इंग्लैंड देश का यह हाल है, सो हमारे पिछड़े हिंदुस्तान में ट्रेड यूनियन का हाल क्या होगा? कोई भी यूनियन कुल कामगारों में से 50.1 प्रतिशत कामगारों को अपना सदस्य नहीं बना सकती। परिणामतः मालिकों की मंजूरी पर निर्भर ऐसी गुलाम यूनियन्स कामगारों की ओर से केवल सुलह की बातचीत मेंं शामिल हो सकती है।
किसी भी उद्योग में या किसी भी स्थान पर होने वाले उद्योग में एक ही यूनियन हो ऐसा इस बिल के आधार पर तय किया जाने वाला है। इस धारा के कारण हिंदी ट्रेड यूनियन्स के विकास पर रोक लगेगी ऐसा मुझे लगता है। दुनिया के किसी भी अन्य देश में क्या यह पद्धति लागू की गई है? इंग्लैंड के ट्रेड यूनियन्स के बारे में मैंने अध्ययन किया है। इसलिए उनके बारे में मैं पूरे यकीन के साथ और सबूतों समेत यह कह सकता हूं कि उपर्युक्त बातें वहां लागू नहीं की गई हैं। अंग्रेजी कानून ने किसी भी सिद्धान्त और नीति के आधार पर मजदूर वर्ग को संगठन बनाने की इजाजत दी है। किसी एक उद्योग में या किसी एक व्यवसाय में एक ही यूनियन हो यह सिद्धान्त इंग्लैंड में प्रचलित नहीं है।
इस बिंदु के समर्थन में डॉ. अम्बेडकर ने ‘ The Employment Exchange of Great Britain ’ किताब का एक हिस्सा पढ़ कर सुनाया।
इंग्लैंड में सार्वजनिक यूनियन को पूरी मान्यता है। विभिन्न उद्योगों में कार्यरत कामगार संगठित होकर एक ही यूनियन की स्थापना कर सकते हैं। जनरल यूनियन के सदस्य एक ही उद्योग के विभिन्न व्यवसायों में नौकरी करते हैं। मतलब, विभिन्न उद्यागों में लगे मजदूर एक यूनियन के सदस्य बन सकते हैं। इंग्लैंड में कामगारों को इस बात की छूट दी गई है कि वे अपनी तरह से अपना संगठन बनाएं। इंग्लैंड जैसे विकसित राष्ट्र में जब ऐसे हाल है तो फिर हिंदुस्तान जैसे पिछड़े राष्ट्र के लिए इस प्रकार के बिल की क्या आवश्यकता है यह बात समझ में नहीं आती। *
* ख्., इससे आगे जो भाषण थे वे अंक प्राप्त नहीं जो पाए।