143 16.10.1938 पूंजीपतियों की कृपा से मेहनतकशों का कल्याण होना असंभव है - परेल (मुंबई) - Page 211

190 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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* पूंजीपतियों की कृपा से मेहनतकश वर्ग का कल्याण होना असंभव है

पूर्वघोषित कार्यक्रम के अनुसार पिछले रविवार यानी 16 अक्तूबर, 1938 को शाम 6.30 बजे मुंबई की प्रमुख कामगार संस्थाओं के तत्वावधान में खास कर लेबर पार्टी और ट्रेड यूनियन काँग्रेस की कामगारों की एक संयुक्त परिषद का परेल के कामगार मैदान में आयोजन किया गया था। परिषद का अध्यक्ष स्थान स्वीकारा था बै. जमनदास मेहता ने स्वीकारा था। मुंबई प्रांतीय एसेंब्ली में कामगारों के हितों की रक्षा के नाम पर काँग्रेस मंत्रीमंडल द्वारा मुंबई प्रांत एसेंब्ली में जो ट्रेड डिस्प्यूट बिल रखा गया था। इस बिल का विरोध करने के लिए 50 हजार कामगारों की यह प्रचंड परिषद हो रही थी। साथ ही इस परिषद में 9 नवंबर, 1938 को मुंबई इलाके में एक दिन को सार्वजनिक हड़ताल की गई थी। इस परिषद में कामगारों ने अपना निश्चय जाहिर किया कि इस सरकारी बिल के लिए कामगारों को कितना तीव्र विरोध है यह वे सरकार को दिखा देंगे।

पिछले रविवार के दिन इस परिषद के काम के लिए कुछ कामगार और उनके नेता कामगारों की बस्तियों में कार-लौरी आदि वाहनों में बैठ कर घूम रहे थे। घोडपदेव की तरफ से जब उनके वाहन आदि गुजर रहे थे तब मौके की जगहों पर छिप कर कुछ गुडों ने उनके वाहनों पर पत्थर फेंके। अचानक हुई पत्थरों की वर्षा में 10-12 कामगारों को काफी चोटें आईं। उन कामगारों के खून से सने कपड़े बै. मेहता ने सभा में सभी को दिखाए। उस वक्त कामगारों ने खुलेआम काँग्रेस की गुंडागर्दी को प्रति तीव्र निषेध व्यक्त किया है। बै. जमनादास मेहता ने अपने शुरूआती भाषण में काँग्रेस के इस हिंसक बर्ताव का तीव्र शब्दों में निषेध किया।

उसके बाद कॉ. मिरजकर ने प्रस्ताव का मसौदा पढ़ कर सुनाया। विधायक खेडगीकर, अैड जोशी, श्यामराव पहलेकर, बी. टी. रणदिवे, जोगलेकर, श्रीमती उषाबाई डांगे, ओक, पाटकर, कॉ. निमकर, जे. बुखारी, स्वतंत्र लेबर पार्टी के सचिव भाई डी.वी. प्रधान, विधायक भोले, मध्यप्रांत के कामगार नेता श्री दशरथ पाटील, भाई, जयवंत आदि नेताओं के भाषणों के बाद तालियों की गड़गड़ाहट के बीच डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का भाषण शुरू हुआ।

पहले उन्होंने वहां जुड़े कामगारों की एकता के लिए उनका अभिनंदन किया। आगे वह बोले-

आज यहां आकर कामगार नेताओं और मेरे कामगार भाई-बहनों के आगे बोलने का यह जो मौका मुझे मिला है वह अपूर्व है। जिस बिल का सार्वजनिक धिक्कार करने के लिए

* जनताः 22 अक्तूबर, 1938