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आप यहां इक्ट्ठा हुए हैं उस बिल का मैंने एक बार एसेंब्ली में विरोध करते हुए बताया है कि यह बिल अन्यायकारी है। सरकार की इस बिल को अपनाने की नीति का भी मैंने विरोध किया था। उसके बाद अधिक समय देकर इस बिल के बारे को काम करना मेरे लिए संभव नहीं हो पाया। इस बात का मुझे खेद है। लेकिन इस बिल को लेकर लड़ने का सारा काम मेरे मित्र बैरिस्टर जमनादास मेहता ने अपने कंधों पर लिया और बेहतरीन ढंग से उसे निभाया इसके लिए मैं सार्वजनिक रूप से अभिनंदन करता है। कामगार प्रतिनिधियों ने वर्तमान एसेंब्ली में काँग्रेस का ध्यान इस बात की ओर दिलाने की बहुतेरी कोशिश की है कि यह बिल किस प्रकार कामगारों की आजादी और हित संबंधों के खिलाफ है।
आज की परिषद में कार्यकर्त्ताओं ने निर्णय किया है कि इस बिल के बारे में असंतोष व्यक्त करने के लिए वे एक दिन की सार्वत्रिक हड़ताल करेंगे। उनकी इस हड़ताल के लिए मेरी पूरी अनुमति है। अपनी संघ शक्ति के बल पर इस घातक बिल को नेस्तनाबूत करने की कोशिश करना उनके लिए हितकारी ही साबित होगा। इस देश में 1850 मिलें, कारखाने आदि चलने लगे हैं। तब वे अब तक हजारों हड़तालें हुईं। इन हड़तालों के दौरान कामगारों के इस न्यायपूर्ण हथियार पर किसी ने आपत्ति नहीं की। गुलामी को उजागर करते हड़ताल के हथियार को अफसरशाही ने भी कभी अपने अधिकारों के बल पर छीनने की कोशिश नहीं की। लेकिन आज, अपने को कामगारों की हितरक्षक कहलाने वाली गुलामी का धिक्कार करने वाली काँग्रेस ने, अपने मुंबई मंत्रीमंडल के जरिए इस उज्जवल परपंरा को धता बताते हुए ट्रेड डिस्प्यूट बिल जैसा काला कानून कामगारों की सिर पर लाद दिया है। कोई भी सरकार अगर जनता को नापसंद कानून अगर बनाती है तो उसका विरोध करने के लिए असहकारिता की लड़ाई जरूरी है। असल में यह काँग्रेस के पंचप्राण गांधी की दी हुई सीख है जो उन्होंने इस देश को लोगों को दी है। गुरु से प्राप्त इस विद्या का प्रयोग कामगारों को अब गुरु के ही खिलाफ करना पड़ रहा है। लेकिन शांतिपूर्ण ढंग से इस मसले पर सोचा है। उसी के बल पर कहता हूँ कि केवल सार्वजनिक हड़तालों से निषेधकारी प्रचंड सभाओं या जलूसों के सहारे मेहनतकश वर्ग की सर्वांगीण उन्नति, उनके हितों आदि के मसले हल होंगे ऐसा नहीं लगता। उससे कुछ अधिक करना पड़ेगा। और कुछ अधिक के तहत किसी और पार्टी के झंडे के नीचे...अपना आंदोलन ले जाने के बजाए अपने स्वतंत्र पक्ष की स्थापना करना ही हर तरह से उपयुक्त होगा। मेरे कई मित्र उपदेश दे रहे हैं कि मैं काँग्रेस में शामिल हो जाऊं। लेकिन मैं जानता हूं कि अपनी लड़ाई हमेशा अपने पैरों पर खड़े होकर ही लड़नी होगी। किसी से भीख मांग कर हम कभी अपना काम पूरा नहीं कर सकते। अपनी हिम्मत ही असली मार्गदर्शक होती है। इसीलिए पूंजीपतियों की कृपा पर पलने वाली काँग्रेस के हाथों मेहनतकश वर्ग का कल्याण हो पाना संभव नहीं। इसके लिए कामगारों को ही पूरी राजनीतिक सत्ता को काबीज करने के लिए अपने अलग पक्ष की निशानी के साथ वीरतापूर्ण तरीके से लड़ना जरूरी है।