192 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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* जब महात्माजी से मेरी मुलाकात हुई थी...
डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर अहमदाबाद आएंगे उसका पता चलते ही अहमदाबाद के कुछ काँग्रेस श्रेष्ठियों के दिल में कसमसाहट होने लगी। येन-केन प्रकरेण उनका आना रोकने के लिए टेलिग्राम-टेलीफोन के द्वारा मुंबई से लंबी गुफतंगू हुई लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ। वे आएंगे ही इस बात का पता चलते ही अहमदाबाद में उनका धिक् कार और निषेध करने की असफल कोशिशें भी हुईं।
22-23 अक्तूबर, 1938 के दो दिनों में अहमदाबाद में डॉक्टर साहब रहे। इस दौरान उनके सम्मान और भाषणों के कम से कम पंद्रह कार्यक्रम हुए। उनके सभी कार्यक्रम बहुत ही जोरदार ढंग से हुए। गुजरात वर्नाकुलर सोसाइटी के प्रेमाबाई हॉल का समारोह वर्तमान राजनीति के हिसाब से बहुत महत्वपूर्ण रहा। वहाँ दलित नवयुवक मंडल की ओर से मिले मान-पत्र का जवाब देते हुए डॉ. बाबासाहेब ने जो जोरदार और बोधप्रद भाषण किया। उसी का कुछ हिस्सा यहां दिया जा रहा है जो पढ़ना सबके लिए बहुत जरूरी है।
वह गांधी के विरोधक हैं और वह काँग्रेस में शामिल नहीं होते इन दो आरोपों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा-
मुझ पर आरोप है कि मैं गांधी का विरोधक हूं। मैं उन्हें मानता नहीं। यह बात सच है। मैं गांधी का विरोधक हूं और यह बात मैं गुजरात के पाटनगर में, गांधी के गढ़ में आप सभी के सामने सार्वजनिक रूप से कहता हूं। यह कहते हुए मुझे कोई दिक्कत नहीं है। मैं जानता हूं कि गांधी के खिलाफ बोलना कोई आसान काम नहीं है। आज करोड़ों लोग उन्हें अवतार पुरुष मानते हैं। दुनिया के सामने वे हिंदुस्तान के एकलौते प्रतिनिधि के रूप में इतराते फिर रहे हैं। लोग उन्हें साधु, महात्मा मानते हैं। गांधी के पैरों में लोट कर ‘जी हुजूर’ रटने से क्या फायदा होगा यह मैं जानता हूं। सुभाष बोस को ही देखिए। 1932 में विठ्ठलभाई पटेल के हाथ से हाथ लगा कर उन्होंने क्या कहा था?
महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थगित किया सुन कर आश्चर्य लगा। राष्ट्र में आज तक जो कार्य हुआ था उस पर गांधी ने लेखनी के एक फर्राटे से कालिख पोत दी है। पिछले 13 सालों में वितक्षण स्वार्थयाव और आत्मयज्ञ कर इस
* चित्राः 6 नवम्बर, 1938