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हिंदी राष्ट्र की अपने आंदोलन के लिए जो कीर्ति और इज्जत कमाई थी वह महात्मा गांधी के इस आंदोलन को स्थिगित करने के इरादे से खत्म कर दी है। आंदोलनों को इस प्रकार बीच में ही स्थगित करने का उन्हें क्या अधिकार है यह मेरी समझ में नहीं आ रहा। नेपोलियन ने एक बार ‘आई. एम दी स्टेट’ कहा था। आज गांधी अप्रत्यक्ष रूप से लोगों से कह रहे हैं ‘आइ एम दी काँग्रेस’। सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित करना यानी काँग्रेस का कार्यक्रम असफल होने की बात कबूलना है। हमारी निजी राय यही है कि एक राजनीतिक नेता के रूप में असफल हुए हैं। इस प्रकार गांधी को गालियां देने वाला यह व्यक्ति आज राष्ट्रभक्त है। बाद में उनके द्वारा गांधी भक्ति की ओढ़ी हुई चादर इस कायापलट की वजह है। चंदे के चार आने और टोपी के दो आने खर्च कर अगर मैं काँग्रेस में शामिल हो जाऊं तो मैं जानता हूं कि मैं जो मांगू वह सम्मान मुझे मिलेगा। लेकिन ऐसा सम्मान मैं ठोकर से उड़ा देता हूं। मैं क्यों गांधी का विरोध करता हूं? मैं अपने स्वार्थ के लिए तो गांधी का इस्तेमाल नहीं करता हूं? यह महात्मा विश्वासघात है इसलिए मैं उसका विरोध करता हूं। उनके विश्वासघातक करने मेरे पास कई सबूत हैं। मेरे अपने काम में मुझे इसका प्रत्यक्ष अनुभव भी मिला है। इसीलिए में उनका विरोध करता हूँ और करता रहूंगा। गांधी को मैं दगाबाज क्यों कहता हूँ यह मैं आपको बताता हूं। राउंड टेबल कॉन्फरेंस के लिए हिंदुस्तान के दलित वर्ग के प्रतिनिधि के रूप में इंग्लैंड जाने से पहले मैं गांधी से मिला था। उस वक्त उन्होंने कहा था कि अस्पृश्यों को अलग से सीटें देने के मैं खिलाफ हूं। हालांकि, आगे और बातचीत हुई तो अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के प्रतिनिधि अगर अस्पृश्यों की मांगे स्वीकारते हैं तो मैं बीच में अड़ंगा नहीं डालूंगा यह बात मानी थी। आगे हम विलायत जाएंगे। दूसरी राऊंड टेबिल कॉन्फरेंस में गांधी भी आए। मैं जिस काम से गया था उसके बारे में चर्चा चल ही रही थी। एक दिन सरोजनीबाई मुझे गांधी के पास ले गइंर्। अस्पृश्यों का क्या कहना है यह वे जानना चाहते थे। रात 10 बजे का समय था। हम पहुंचे तब गांधी चरखा चलाते हुए बैठे थे। मुझे जो बताना था वह मैंने उन्हें बताया। मेरी बातें चल रही थी, गांधी का चरखा भी चल रहा था। डेढ घंटों तक मैं वहां बैठा था। उतनी देर में गांधी ने मुझसे एक शब्द तक नहीं कहा। आखिर उनका चरखा चलाना रुका और हम उठे तब गांधी ने मुझसे इतना ही कहा, ‘‘मैंने आपकी कही बातें सुनी। मैं जरूर उन पर गौर करूंगा।’’ फिर मैं वहां से लौट आया।
आगे एक बार संदेश आया कि गांधी ने सभी अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधियों को बुलाया है। हम सब मिलने गए। सुना था कि नामदेव की शादी में किसी ने समधियों में से हरेक से पूछा था, ‘‘आप क्या चाहते हैं?’’ उसी तर्ज पर गांधी ने हम में से हरेक से आपको क्या चाहिए?’’ पूछा ‘‘सबने अपनी मांगे गांधीजी के सामने रखीं। सबकी बातें सुनने के बाद आखिर में गांधी ने कहा, ‘‘मैंने आप सबकी बातें सुनीं। सभी बातों पर