144 22/23.10.1938 जब महात्माजी से मेरी मुलाकात हुई थी.... - अहमदाबाद - Page 215

194 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मैंने ठीक से गौर किया है। मैं अस्पृश्यों को कुछ भी नहीं देना चाहता।’’

उसके बाद अल्पसंख्य प्रतिनिधियों की (माइनॉरिटी कमेटी) बैठक हुई। अध्यक्ष स्थान पर थे रैम्से मैकडोनल्ड। कामकाज की शुरूआत होने से पहले ही मुसलमानों ने स्थगन की सूचना रखी। कारण था कि वे गांधी से अकेले में बात करना चाहते थे। मैं आश्चर्यचकित था। मुझे इस घटना का मतलब ही समझ नहीं आ रहा था। मैं उठा और मैंने स्थगन की सूचना का विरोध किया। मैंने कहा अगर यह चर्चा अल्पसंख्यकों के हकों के बारे में है तो फिर- अकेले गांधी से क्यों? हम उसमें शरीक क्यों नहीं हो सकते? इससे पहले भी निजी तौर पर मिलना-जुलना हो चुका है। अस्पृश्यों की मांगों के बारे में अगर यह बैठक हो रही है तो हमें हटा कर क्यों हो इस बात को गांधी अपना कहना स्पष्ट करें। इस पर अध्यक्ष ने गांधी से इस बारे में उनका क्या कहना है यह पूछा। तब गांधी ने कहा, ‘‘मैं खुद अस्पृश्यों को कुछ भी देना नहीं चाहता। लेकिन अगर अन्य अल्पसंख्य प्रतिनिधि अस्पृश्यों की मांगें मान लेते हैं तो मैं उनका विरोध नहीं करूंगा।’’ ये मेरी मनगढ़ंत बातें नहीं हैं। राउंड टेबल कॉन्फरेंस की प्रोसिडिंग्स में वे दर्ज हैं। जो भी चाहे देख सकते हैं। आखिर मेरे विरोध का कोई फायदा नहीं हुआ और सभा स्थागित कर दी गई।

उसके बाद जो भी कुछ हुआ, गांधी ने जो कुछ किया वह मेरे दिल पर हमेशा के लिए खुद गई हैं। इसी से मुझे यकीन हुआ है कि गांधी दगाबाज आदमी है।

अल्पसंख्य समिति की सभा में इस प्रकार का भाषण देने के बाद इस महात्मा ने क्या किया होगा? अपनी बात अमल में लाने के लिए उन्होंने एक नामी जुगत ढूंढ ली। उन्होंने कुरान के पन्ने खंगाले। मन ही मन कुछ तय किया और रिट्झ होटल में आगाखान के कमरे में हो रही मुसलमानों की निजी बैठक में वह पहुंच गए। वहां कुरान को उनके सामने धर कर वह बोले, ‘‘देखिए, आपका धर्मग्रंथ क्या कहता है। किसी भी समाज में फूट डालना क्या इस्लाम धर्म के अनुकूल है?’’ उन्होंने कहा, नहीं। गांधी बोले, ‘‘तो फिर, क्या आप लोग एक बड़ा अधर्म नहीं करने जा रहे? अस्पृश्यों की मांगे मान कर आप हिंदू धर्म में फूट डाल रहे हो। आपका यह कृत्य इस्लाम धर्म के खिलाफ है। उन लोगों ने पूछा, ‘‘लेकिन गांधी जी, इसमें धर्म का क्या ताल्लुक है? यह राजनीतिक हकों का सवाल है। हम अस्पृश्यों से अधिक संपन्न, अधिक सुस्थिर, अधिक उन्नत हैं। कुछ राजनीतिक अधिकार पाने के लिए हम लड़ रहे हैं। हमें और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों को जो हक मांगने और पाने का अधिकार है वे हक अस्पृश्यों को देना सही और सरल है। इसमें आश्चर्य की क्या बात है?’’

कुरान के बहाने किया गया हमला खाली गया वह देख कर गांधी ने दूसरा और इससे अधिक बेशर्मी भरा तरीका अपनाया। उन्होंने कहा, ‘‘ठीक है। आपकी 14 मांगें