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तो आप पूरी करना चाहते हैं ना?’’ ‘‘जी जरूर चाहिए।’’ ‘‘मैं आपको वे दिला दूंगा लेकिन आपको मेरा काम करना होगा। समिति में अगर आप अस्पृश्यों की मांगों को नकार दें, उन्हें मानने से इंकार कर दें तो मैं आपकी चौदहों मांगें मंजूर होंगी इसकी तजवीज करता हूँ।’’
अस्पृश्यों को कुछ भी नहीं देना है अपनी जिद को पूरा करने के लिए यह महात्मा किस हद तक जा सकता है यह देखने के बाद क्या कोई उनका विश्वास कर पाएगा? मुसलमानों के साथ उनके इस करार का मसौदा मेरे पास है। अपनी किताब में मैं उसे प्रकाशित भी करने वाला हूँ। मैं कोई हवाई गप्प नहीं झाड़ रहा।
मुझ पर एक और आरोप लगाया जाता ह कि मैं काँग्रेस के साथ हाथ नहीं मिलाता। यह बात सच है। वैसे काँग्रेस के साथ हाथ मिलाने से क्या फायदे मिल सके हैं इसकी झलक मैंने आपको दी है। मुझे काँग्रेस से मिलाने की कोशिशें भी की गई हैं। ऐसी ही एक कोशिश के बारे में मैं आपको बताता हूं। ताकि काँग्रेस से जा मिलने का रहस्य आपको भी पता चल सकेगा। 1935 में मेरे एक मित्र आग्रह के साथ वर्धा ले गए कि गांधी के साथ सुलह करवाएंगे। मैं जानता था कि मेरे जाने का कोई फायदा नहीं होने वाला। लेकिन दोस्ती की खातिर मैं गया। शेगाव में गांधी से मुलाकात हुई और मेरा अंदाजा बिल्कुल सही निकला। हम लौट कर वर्धा में सेठ जमनालालजी के यहाँ लौटे वहां कुछ और लोग मुझे समझाने लगे। जमनालालजी ने कहा-
‘‘देखो डॉक्टरसाहब, आप बड़ी भूल कर रहे हो।’’
मैंने पूछा, ‘‘कैसे भला?’’
वह बोले, ‘‘देखो, काँग्रेस से मिलेगा तो तुम्हारा कितना हित होगा सोचो तो। अस्पृश्योद्धार का आंदोलन हम आपके हाथ देंगे। पहले हम मारवाड़ी समाज के बारे में क्या कहा जाता था, क्या आप जानते हैं? मारवाड़ी लोग यानी समाज को लगी जोकें हैं। रैय्यत का घर-बार लूटने वाले, उल्टी खोपड़ी के बदमाश हैं वे। लेकिन आज? आज मारवाड़ी राष्ट्र पुरुष हैं। हर जगह उनका बड़पन माना जाता है। इसकी क्या वजह है? इसकी वजह यही है कि आज हम काँग्रेस से मिले हुए हैं। आप काँग्रेस के साथ जुड़ जाइए, आप भी राष्ट्रपुरुष बनेंगे।’’
मैंने कहा, ऐसा कैसे हो सकता है? गांधी पर मेरा कोई भरोसा नहीं है। मुझे उनके काम में विश्वास नहीं है। मेरे और उनके बीच मतभेद हैं। काँग्रेस के साथ अगर मैं मिला तो उनके साथ काम कैसे कर पाऊंगा?’’
‘‘यह कोई बड़ी बात नहीं। मतभेद हैं तो क्या हुआ? जवाहरलाल नेहरू को देखिए। उनके भी गांधी के साथ मतभेद हैं। कई मामलों में उनमें ठन भी जाती है। लेकिन वह