197
145
* राजनीति में बोला हुआ तुरंत भूल जाना चाहिए
26 अक्तूबर, 1938 को मध्यप्रांत वन्हाड के कार्यकर्त्ताओं का एक प्रतिनिधिमंडल डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर से उनके राजगृह जाकर मिला था। उनका कहा सुनने के बाद डॉ. अम्बेडकर द्वारा उन्हें जो हितोपदेश दिया था वह आगे दिया जा रहा है। खुद लेखक कार्यकर्त्ताओं के उस प्रतिनिधिमंडल में शामिल थे। डॉ. अम्बेडकर ने उस वक्त जो भी कहा था वह लेखक द्वारा दर्ज कर रखा गया है। वही यहां दिया जा रहा है।
सुबह 7 बजे कार्यकर्त्ता डॉ. बाबासाहेब से मिले। उस वक्त डॉ. बाबासाहेब गंभीर और शांत दिखाई दे रहे थे। चेहरे पर दृढ़ता का तेज था।
कार्यकर्त्ताओं के साथ हुई चर्चा के बाद हमें उद्देश्य कर वह बोलने लगे। उस वक्त हमें लग रहा था कि उनके मुंह से स्वाभिमानी तेजस्वी शब्द निकल रहे हैं।
डॉ. अम्बेडकर ने कहा-
मध्यप्रांत वन्हा़ के कौंसिल इलेक्शन हुए अब करीब डेढ़ साल बीत चुके हैं। इतने समय में हम कुछ कर ही नहीं पाए। आपको 20 सीटें दिला दीं। उनमें से केवल 7 सीटें ही हमें मिल पाईं। 13 सीटों को जीतने के लिए हम कुछ कर नहीं पाए। जीते हुए सात लोगों में भी कभी आपसी अपनापन दिखाई नहीं दिया। उनमें कभी एका नहीं रहा। हमारी मुंबई में आप देखें तो पाएंगे कि हमारे स्वतंत्र लेबर पार्टी का ऑर्गनाइजेशन काँग्रेस से भी बेहतर है। लोगों में जागृति पैदा करना और राजनीति में संगठन बनाए रखना दो अलग बातें हैं।
चुनाव के बाद आपने कितने सदस्य बनाए? पिछली बार केस के सिलसिले में आया था तब पूछताछ की थी तब पार्टी के नए सदस्य बनने की कोई खबर नहीं मिली थी। वहां स्वतंत्र लेबर पार्टी का कोई दफतर नहीं है। कोई अगर मदद मांगने आए भी, किसी को अगर कोई शिकायत भी हो तो उसके समाधान का इंतजाम करने की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं। आपके पास पैसा नहीं है। पैसों के बगैर राजनीति चले कैसे? पैसों के लिए किसी एक व्यक्ति पर निर्भर रहने से काम नहीं चलता। हमने जो सदस्य जोड़े हैं उनमें से ज्यादातर स्थायी सदस्य हैं इसीलिए राजनीति चलती है। आप लोगों ने ऐसा कोई इंतजाम नहीं किया है। और जो मैं बताता हूं वह भी आप नहीं करते। मैं केवल मुंबई
* विदर्भ के दलित आंदोलन का इतिहासः एच. एल. कोसारे, पृष्ठ 517-518