200 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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* मालिकों-मजदूरों के झगड़े मिटाने वाला कानून असल में मजदूरों
का बेड़ा गर्क करने वाला कानून है
रविवार 6 नवम्बर, 1938 की शाम को परेल के कामगार मैदान में आयोजित सार्व जनिक सभा में एक लाख से अधिक कामगार उपस्थित थे। कामगारों की यह विराट सभा देखने वालों को शुरू से पता चल चुका था कि 7 नवम्बर को पुकारी गई कामगारों की एक दिन की हड़ताल पूरी तरह सफल होने वाली थी। उस दिन सभा के अध्यक्ष बैरिस्टर जमनादास मेहता और शामराव परुलेकर, भाई याज्ञिक, एस. ए. डांगे, मिरजकर आदि के भाषण हुए। इस सभा में उपस्थित विराट जनसागर के सामने बोलते हुए डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने कहा-
मुझसे पहले जो वक्ता बोले उन्होंने आपको बता ही दिया है कि आज हम यहां मुंबई सरकार द्वारा एसेंबली में जो ‘‘ट्रेड डिस्प्यूट बिल’’ लाया गया है उसके प्रति अपना निषेध व्यक्त करने के लिए जुटे हैं। इस बिल को ‘ट्रेड डिस्प्यूट बिल’ या फिर मालिकों-मजदूरों के झगड़े मिटाने वाला कानून कहा जा रहा है। इस बिल के जरिए कामगार वर्ग की गर्दन कैसे दबोची गई है इसका वर्णन मैं अभी नहीं कर सकता। क्योंकि इस बारे में मुझसे पहले जो वक्ता बोले उन्होंने और एसेंब्ली के सदस्यों ने पिछले दो-ढाई महीनों से बड़े उत्साह और कर्त्तव्यतत्परता से की है। अखबरों में हमने वह पढ़ी है। आज आपसे मैं बस इतना ही कहना चाहता हूं कि काँग्रेस सरकार के सत्ता में आने के बाद कामगारों के बारे में इतना अन्यायकारी कानून संख्या बल के सहारे पारित कराने का काम काँग्रेस ने किया है। केवल इतना ही नहीं वरन् इस अन्याय की ओर ध्यान दिलाने वालों के खिलाफ झूठा, निंदाजनक और बेशरम होकर, प्रचार करने वाली काँग्रेस पार्टी की शान ने अधोगति को प्राप्त हुई है इस बात को हम भुला नहीं सकते।
पराए और किराए के टट्टू खद्दरधारियों से लेकर ठेठ काँग्रेस के भालुओं तक सब यही बड़बड़ा रहे हैं कि मजदूरों के नेता स्वार्थी और चालक हैं। आज मैं आपसे एक साफ-साफ पूछता हूं कि- 1930-34 साल में काँग्रेस द्वारा मजदूरों के हितों से संबंधित नीति स्पष्ट की गई थी। इस नीति को कचरे के टोकरे में डालकर मजदूरों का बेडा गर्क करने वाला कानून बनाने वाले काँग्रेस ने नेता चालाक हैं या कि सत्ता पाकर अन्धी हो चुकी काँग्रेस पार्टी की ओर से हो रहा अपमान सह कर कामगारों का पक्ष एसेंब्ली में
* जनताः 12 नवम्बर, 1938