149 12.12.1938 बेलिपफ मेरी किताबों को छू भी ले तो मैं उसे गोली मार दूंगा - मुंबई - Page 228

207

149

* बेलिफ मेरी किताब को छू भी ले तो मैं उसे गोली मार दूंगा

अस्पृश्य छात्रों की ओर से मुंबई में आयोजित किया आने वाला ‘मुंबई अस्पृश्य विद्यार्थी आंदोलन’ 10, 11, 12 दिसम्बर, 1938 के दिनों में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। 12 दिसम्बर के दिन सम्मेलन के अध्यक्ष पद से डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने छात्रों को उपदेश किया। तालियों की गड़गड़हाट के बीच तथा छात्राओं की ओर से की जा रही फूलों की वर्षा में डॉ. बाबासाहेब भाषण देने खड़े हुए। उन्होंने कहा-

‘‘आज आपने मुंबई में अस्पृश्य छात्रों का सम्मेलन आयोजित किया है आर सभी मायनों में वह सफल रहा है। इस कार्यक्रम के लिए आपका और सम्मेलन में जिन छात्रों ने हिस्सा लिया उन सभी का मैं अभिनंदन करता हूं। शनिवार और रविवार के दिन मैं नासिक में था। यात्रा की परेशानियां से मेरी सेहत खराब हुई है। मुझमें बोलन तक की ताकत नहीं बची है। मैं बस यह बताना चाहता हूं कि आज यहां उपस्थित रह सका इसमें मुझे बड़ी खुशी है।

इस तरह के कई सम्मेलन होते हैं। एसे आयोजनों में जब कोई अध्यक्ष आता है- मैं हमेशा देखता हूं- वह जब भाषण देता है तब छात्रों को एक उलाहना देता है, आप पढ़कर कहेंगे क्या? सरकारी नौकरी? उन्हें देश सेवा करने का उपदेश दिया जाता है। लेकिन इसका कोई मतलब नहीं। छात्रों के बारे में मैंने जो कुछ सोचा है उसके आधार पर मैं बस इतना कहना चाहता हूं कि यह उपदेश झूठा होता है और मैं इस प्रकार का कोई उपदेश आपको नहीं देने जा रहा हूं। छात्र पढ़ कर अगर नौकरी करे तो उसमें पाप कैसा? उसकी भी जिंदगी है, उसकी भी भावनाएं हैं। हर व्यक्ति का अंतिम लक्ष्य क्या है? अपने गुणों को फलने-फूलने का मौका मिले, बस यही ना? उसका अच्छा फल मिला। इसलिए मैं आपका उनके जैसा कोई उपदेश नहीं करूंगा। आप सकारी नौकरी पाने की पूरी-पूरी कोशिश करें। मुझे जो अनुभव प्राप्त हुआ है उसके आधार पर मैं बस इतना कहूंगा कि आजकल सरकारी नौकरी एक विशिष्ट जाति का एकाधिकार हो गया है। कलक्टर का दफतर हो या अन्य कोई भी सरकारी दफतर हो एक ही जाति के लोग वहां मिलेंगे। कई लोग पूछते हैं, आप नौकरी के पीछे इस तरह हाथ धोकर क्यों पड़े हैं? योग्यता हो तो नौकरी मिल ही जाती है। उसमें जाति को क्यों घसीटते हैं? लेकिन अपनी सामाजिक स्थिति के बारे में सोचा जाए सो पता चलेगा कि नौकरी के क्या फायदे हैं

* जनताः 17 दिसम्बर, 1938