208 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
यह पूछना मूर्खता है। इस देश में जातिभेद बहुतर हावी है। आज जिसके हाथ में पैसा है असली सत्ता उसी के हाथ में है। वह विवेक के साथ उसका इस्तेमाल करने के बजाय अपनी रोटी पर घी चुपड़ने के लिए ही उसका इस्तेमाल करता है। नौकरी करने से हाथ में तनवख्वाह आती है। जिस समाज के पास सरकारी नौकरियां नहीं अधिकार के पदों पर जिस समाज के लोग नहीं है उसकी स्थितियों में कभी कोई सुधार नहीं आएगा। ब्राह्मण समाज सरकारी नौकरियों में लगा है। इसलिए उसके पास सामर्थ्य है। वह अपनी वर्चस्विता बनाए रख सकता है। इसीलिए सरकारी नौकरी पाने की कोशिश से आपकी उन्नति होगी। आप जरूर पूरी ताकत लगाकर इस बात की कोशिश करें।
पढ़े-लिखें आदमी में भी कुछ दोष होते हैं। हालांकि पढ़ाई के बाद नौकरी पाने की कोशिश करने में कोई बुराई नहीं। आप जरूरी कोशिश करें कि कोई बुराई आपके अंदर ना आए। पहली बात यह याद रखिए कि पढ़ने के बाद आदमी स्वार्थी हो जाता है। मनुष्य का स्वार्थी होना स्वाभाविक है लेकिन पढ़ा-लिखा मनुष्य केवल अपने हित की सोचता है। समाज के हित की नहीं सोचता। वह केवल अपनी पत्नी और बच्चों की तथा खुद अपनी ही चिंता करता है, समाज के हित की वह नहीं सोचता। मैझिनी कहते हैं, ‘‘परतंत्र फैलता है तब इंसान पढ़-लिख ले तो भी उसमें कर्तव्यों से अधिक हकों का अहसास तीव्रतर होता जाता है।’’ अपना कर्तव्य क्या है यह भावना उसमें जागृत नहीं होती।’’ यह पढ़े-लिखे आदमी का दोष है कि उसके मन में कर्तव्य की भावना नहीं जागती।
पढ़े-लिखे आदमी को जब उपाधि मिलती है और जब उसे नौकरी मिलती है तो उसकी पढ़ाई का रास्ता हमेशा के लिए बंद हो जाता है। पढ़ाई का महत्व उसके लिए
खत्म हो जाता है। विद्या प्राप्ति का महत्व रुक जाता है। मैं जब यात्रा के लिए निकलता हूं तब हमेशा मेरे पास चार किताबें और अखबार होते हैं। परन्तु, यात्रा के दौरान मैं जब पढ़े-लिखे लोगों से मिलता हूं तब देखता हूं कि उनके हाथ में किताबें या अखबारों की जगह सिगरेटों की डिब्बियां होती हैं। अगर कोई बीए तक पढ़े तो क्या उसे आगे की पढ़ाई की जरूरत नहीं होती? बीए या एमए हो तो सभी ज्ञान प्राप्त हुआ यह गलत भावना है। जिस प्रकार अगत्स्य मुनि ने समंदर को पी लिया उसी प्रकार पढ़कर कोई उपाधि प्राप्त करते ही पढ़े-लिखे लोगों को लगता है कि हमने पूरी विद्या हासिल की। बड़ौदा संस्थान में एक आदमी था। वह बीए तक पढ़ा था। महाराज ने एक गांव में उसकी नियुक्ति की थी। उस दौरान गुजराती में ही बड़ौदा रियासत का कामकाज चलता था। अंग्रेजी में नहीं चलता था। वह आदमी बेहद आलसी था। भूले-भटके कभी-कभी टाइम्स अखबार तक नहीं पढ़ता था। परिणामस्वरूप कुछ समय बाद उसे एबीसी तक की पहचान नहीं रही। यह बिल्कुल सच बात है। मेरा भी यही अनुभव है। पीएचडी की उपाधि प्राप्त करने के लिए फ्रेंच और जर्मन भाषाएं सीखने की शर्त हुआ करती थी। तब ये भाषाएं मुझे आती थीं। लेकिन बाद में उन भाशाओं से संपर्क छूट गया तो अब