149 12.12.1938 बेलिपफ मेरी किताबों को छू भी ले तो मैं उसे गोली मार दूंगा - मुंबई - Page 231

210 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

आप में से ज्यादातर अविवाहित होंगे। कइयों की शादियां भी हुई होंगी। लेकिन शादी के बाद आप क्या करने वाले हैं? इस बारे में आप पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। आपके पिता का उदाहरण देने के बजाय मैं अपने पिताजी का उदाहरण आपको बताता हूं। उनके कुल चौदह बच्चे हुए। मैं उनका चौदहवां रत्न! लेकिन एक फिन्स्टन कॉलेज में मैं जब था तब मेरा क्या हाल था? मेरे पास चप्पलें नहीं थीं। लट्ठे की कमीज और पिताजी के फटे हुए कोट पहनता था। एलफिन्स्टन कॉलेज में आप जाएंगे तो वहां आपको भुल्लर साहब की तस्वीर दिखाई देगी। उन्होंने मुझे कॉलेज के आखिरी दो सालों में शर्टस् मुहैया करवाए। तब मेरे मन में ख्याल आता था कि मेरे पिताजी के चौदह के बजाय अगर चार ही बच्चे होते तो मैं कितनी आराम की जिंदगी जी पाता। मेरे दुख के लिए मेरे पिताजी ही जिम्मेदार थे। एक बार कॉलेज जाते समय रेल का पास मैं घर भूला। उसी दिन पास जांचे जाने वाले थे। टिकट लेने वाले मास्टर ने मुझे टोका। मेरे पास फूटी कौड़ी भी नहीं थी। चार बजे तक चर्चगेट के स्टेशन में मैं बैठा रहा था। बाद में मेरी कक्षा का कैकिणी नाम का लड़का वहां आया। उसने पूछा, ‘‘क्यों रे? यहां क्यों बैठा है’’ मैंने सब कुछ उसे बताया। चार आने देकर उसने मुझे छुड़ाया। टिकट लेकर मुझे घर भेजा। इसीलिए इस मामले में मैं अपने पिताजी को ही दोष देता हूं। क्योंकि उन्होंने अपनी जिम्मेदारी को पहचाना नहीं। पिताजी गलती कर रहे हों तो उन्हें यह बात बताना मैं गलत नहीं मानता। अब यह जिम्मेदारी आपकी है। इसी प्रकार यह महिलाओं की भी जिम्मेदारी है। मैं केवल पुरुषों के लिए ही नहीं बोलता। महिलाओं को भी अपनी जिम्मेदारी पहचानना आना चाहिए। आपको इस बारे में सोचना होगा। आप नौकरी पर जाएंगे मुझे लगता है कि आप में से अधिकतर बाबू बनेंगे। करीब 50-60 रु. के तनख्वाह आपको मिलेगी। उसमें अगर आपके चौदह बच्चे होंगे तो उनका भविष्य क्या होगा? उनकी जिम्मेदारी आप क्या समाज पर डालेंगे? इस बारे में आप खूब सोचिए। आप सन्यास नहीं लेना चाहेंगे लेकिन कोई अगर सन्यास ले तो अच्छा ही होगा। (हंसी) हंसो नहीं। यह बेहद महत्वपूर्ण बात है। मेरे पांच बच्चे हैं। उनमें से चार मर गए। इसका अब मुझे अफसोस नहीं होता, उल्टे खुशी ही होती है। ये बच्चे अगर जिंदा होते तो उनकी शिक्षा, खाना-पीना, रहना आदि का मुझ पर बोझ आता। मेरे लिए यह बात परेशानी पैदा करती। मेरा एक ही बेटा है। मुझ पर उसकी पूरी जिम्मेदारी है। उसके शतांश भर जिम्मेदारी भी अगर आप अपने बच्चों के बारे में दिखाएं तो बेहतर होगा। यह समाज के कल्याण की बात है। अगर आपके पांच-छह बच्चों होंगे तो उनकी पढ़ाई कैसे होगी? उनकी बाकी जरूरतें कैसे पूरी करेंगे आप? इसलिए जिम्मेदारी को बढ़ाने के बजाय घटाने में ही समझदारी है। महिला-पुरुषों का पशुओं की तरह जीना इंसानियत को बट्टा लगाने वाला है। आप इस बारे में जरूर सोचिए।