220 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जर्मनी या स्वीट्जरलैंड, कनाडा या आस्ट्रेलिया में से किसी भी राष्ट्र के फेडरेशन के साथ हिंदुस्तान के इस फेडरेशन की तुलना की जाए तो पता चलेगा कि हिंदुस्तान का यह फेडरेशन सचमुच राक्षसी है। विधिमंडल का संविधान लीजिए। मंत्रीमंडल का स्वरूप देखिए या वरिष्ठ न्यायपीठ के अधिकारों को जांचिए। इनमें से किसी भी बात को देखें तो हिंदुस्तान के इस संयुक्त फेडरेशन का कुल स्वरूप विचित्र और अपूर्व ही दिखाई देगा। (1) संयुक्त फेडरेशन के घटक, (2) घटकों का केंद्र सरकार के साथ संबंध, (3) राष्ट्र के बहुजन समाज का संयुक्त फेडरेशन में नागरिकता का संबंध इनमें से किसी भी नजरिए से आगामी संविधान का परीक्षण किया तो वह दोषपूर्ण और अस्वीकार के लायक है यही दिखाई देगा। इस संयुक्त फेडरेशन को संयुक्त संघ या फेडरेशन नाम देने से पहले अलग हुए रियासतों का समूह या कॉन्फिडरेशन कहा जाए तो वह अधिक संयुक्तिक होगा। इस फेडरेशन में संयुक्त से अधिक विभाजन के ही गुण हैं। समूचे राष्ट्र के सभी नागरिकों को सामान्य नागरिकता के अधिकार इस संविधान में नहीं दिए गए हैं। इस प्रकार इस मूलतः सदोष संविधान में कुछ सुधार करने से वह स्वीकाराई होगा कहने वाला एक वर्ग भी है। उनके कहने के अनुसार इस संविधान स्वीकार करने से धीरे-धीरे (1) हिंदी रियासतों में जनतांत्रिक राज्य पद्धति शुरू होगी। (2) हिंदुस्तान को जिम्मेदार राज्य व्यवस्था का लाभ मिलेगा और (3) हिंदुस्तान एक क्षेत्र देश बनेगा। लेकिन लगता है ऐसा कहने वालों ने 1935 का कानून ढंग से नहीं पढ़ा है। इस कानून की धारा 6(1) पढ़ने से तथा उसके परिशिष्ट पर नजर डालने पर पता चलता है कि इस संविधान से समूचा हिंदुस्तान एकछत्र नहीं हो सकता। और न ही उसमें एकता निर्माण होती है। हिंदुस्तान के 650 रियासतों को फेडरेशन में शामिल होने की इजाजत नहीं दी गई है।
मैं यह पूछना चाहता हूं कि क्या इन छोटी रियासतों को शामिल न किए जाने से क्या हिंदुस्तान में एकता बनेगी? इन रियासतों का क्या भविष्य होगा। इसका खुलासा होना भी जरूरी है। इस नए संविधान से रियासतों की एकतंत्री राज्यपद्धति खत्म होगी यह उम्मीद रखना भी गलत होगा। क्योंकि इसी कानून से रियासतदारों को स्पष्ट आश्वासन दिया गया है कि उनकी रियासत के अंदरूनी राजकाज में किसी तरह की दखंलदाजी करने का अधिकार फेडरेशन को नहीं होगा। इतना ही नहीं, इस संविधान ने रियासत की एकतंत्र राज्यव्यवस्था को खालिसा इलाके के जनतंत्र पर जुल्म ढाने के लिए नई सत्ता का निर्माण करवा दिया है। इसी प्रकार संविधान से पूरी तरह जिम्मेदार राज्यव्यवस्था का लाभ भी हिंदुस्तान को नहीं होगा।
सैनिक सुरक्षा और विदेश राजनीति ये दो विभाग/सरकार ने अपने पास रखे हैं। अर्थात् केंद्र सरकार में द्वि-दल राज्यपद्धति शुरू करने वाला यह संविधान है। लेकिन द्वि-दल राज्य पद्धति से जिम्मेदार राज्य व्यवस्था का कैसे दमन किया जाता है इस बात का हमें, हिंदी लोगों को हाल ही में अनुभव हो चुका है। इसके बाबजूद यह सोचना कि केंद्र सरकार