152 30.1.1939 रियासतों का संविधान दोबारा लिख कर पूरे हिंदुस्तान को व्यापने वाली नागरिकता के निर्माण की जरूरत है - पुणे - Page 242

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में उसमें मीठे फल लगेंगे, क्या मूर्खता नहीं है? किसी भी तरह से इस संविधान की छानबीन करें तब भी आपको यही बात समझ आएगी कि उसमें दाखिल का पूर्ण अभाव है। कुछ सुधार करने के बाद इस संविधान को स्वीकारने की सिफारिस मि. सत्यमूर्ति करते हैं। लेकिन मेरा यही मानना है कि भले मि. सत्यमूर्ति के सुझाए सभी सुधार उसमें किए जाएं, तब भी उसकी त्याज्यता छटेगी नहीं। क्योंकि इस योजना में कुछ मूलभूत दोष हैं। इस योजना के सहारे हिंदुस्तान स्वराज्य का लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकता।

हिंदुस्तान का अंतिम राजनीतिक लक्ष्य कया है? काँग्रेस अब संपूर्ण आजादी से डोमिनियन स्टेट्स की ओर उल्टी दिशा में बढ़ती जा रही है। लेकिन मेरी राय में इस फेडरेशन की योजना से डोमिनियन स्टेट्स का मार्ग भी बंद किया जाने वाला है। और इसी कारण आप पाएंगे कि इस संविधान के कानून में ‘डोमिनियन स्टेट्स’ शब्द योजना को पूरी तरह बहिष्कृत किया गया है। फेडरेशन का यह संविधान का स्वरूप अपरिवर्तनीय है। ब्रिटिश पार्लियामेंट भी रियासतदारों की अनुमति के बगैर उसमें परिवर्तन नहीं कर सकती। या फिर, उसे बदलना हो तो फेडरेशन को ही नष्ट करना होगा। डोमिनियन स्टेट्स की राह का पहला चरण जिम्मेदार राज्य पद्धति है लेकिन इस योजना ने आरक्षित विभागों का निर्माण कर यह रास्ता ही बंद कर दिया है। इसके बाद भी सेना और विदेश राजनीति के विभागों हस्तातंरणीय बनाना संभव नहीं लगता है। रियासतदार उसे मान्यता नहीं देंगे।

ऐसे हालात में हिंदी रियासतों का आगे क्या किया जाना चाहिए यह महत्वपूर्ण मसला है। रियासतों की मनमानी व्यवस्था का एक कारण वहां का एकतंत्रीय राज्य पद्धति तो है ही लेकिन कई रियासतों के पास राज्य का कामकाज चलाने के लिए जरूरी साधन उपलब्ध नहीं हैं। किसी भी रियासत का कामकाज ठीक से चलने के लिए विशिष्ट क्षेत्रफल और न्यूनतम आय जरूरी होती है। ये जिनके पास न हो उन रियासतों को रद्द कर उनकी पुनर्रचना करनी चाहिए। राज्य का काम सुचारू रूप से चले इसलिए ऐसा करना जरूरी है। ये रियासतें जब फेडरेशन में शामिल होंगे, फेडरेशन के घटक बनेंगे तब उन्हें नष्ट नहीं किया जा सकेगा और उनका पुनर्गठन भी असंभव होगा। क्योंकि अब तक उनके सार्वभौमत्व की रक्षा का यकीन संविधान में ही दिया गया है।

इसलिए, पहले रियासतों का पुनर्गठन कर, पूरे हिंदुस्तान में लागू नागरिकता निर्माण कर फिर फेडरेशन के बारे में सोचा जाना चाहिए। यह बेहतर रहेगा। रियासतों को अलग रखते हुए ब्रिटिश प्रांतों का फेडरेशन किया जा सकता है। केवल ब्रिटिश प्रांतों की संयुक्त संघों में भी पूरी तरह से जिम्मेदार राज्य व्यवस्था स्थापित करना संभव नहीं। 1935 के कानून के मुताबिक दो फेडरेशन बनाए गए हैं। एक ब्रिटिश प्रांत का और एक अखिल भारत का। इनमें से पहले फेडरेशन को जिम्मेदार राज्य व्यवस्था नहीं दी गई है, दूसरे