222 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
को दी जाने वाली है। इसकी असली वजह यही है कि खालिसा मुलकों के जनतंत्र के पैरों में जंजीरें पहनाने के लिए रियासतदारों का उपयोग किया जाए।
रियासतदार दो कारणों से फेडरेशन चाहते हैं। वे ब्रिटिशों का सार्वभौमत्व नहीं चा हते और उन्हें फेडरेशन की दखलंदाजी भी नहीं चाहिए। मुसलमानों को लगता है कि हिंदुस्तान में मुस्लिम बहुल और प्रांतों का निर्माण किया जाना चाहिए ताकि हिंदुओं को कमजोर किया जाए। हिंदू महासभा इसके विपरीत सोचती है कि रियासतदारों को मिलाकर संयुक्त संघ बनाया जा सकता है जिससे हिंदुओं की सामर्थ्य बढ़ेगी और साथ ही साथ मुसलमानों पर अंकुश भी रखा जाएगा। इसके अलावा व्यापारियों का एक और नजरिया है। यह वर्ग काँग्रेस को धन की खुराक खिलाता रहता है। यूरोपियनों से उन्हें व्यापारिक सुरक्षा मिलना उनके लिए काफी है। ये सभी वर्ग आज हो या कल संयुक्त संघ का स्वागत करेगा ही। लेकिन इनके अलावा गरीब और आजाद लोगों का एक बड़ा तबका है जिनके बारे में इस फेडरेशन में सोचा नहीं गया है। इस फेडरेशन की स्थापना होने से गरीबों की आजादी खत्म हो जाएगी।
मेरा भाषण काफी लंबा होता गया। उसे पूरा करने से पहले एक और बात का मैं जिक्र करना चाहता हूं। पहले हिंदुस्तान की राजनीति भी नेतृत्व की धुरा रानडे, तिलक, आगरकर, गोखले, दादाभाई, फिरोजशाह मेहता, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी जैसे मशहूर नेताओं के हाथ में था। ये सब पुराने नेता अच्छे कपड़े पहनते थे और पढ़ाई के बाद ही बोला करते थे। आज यह रिवाज बदल चुका है। अब ये हालात बदल चुके हैं। आज नेताओं को अधनंगा रहने में गर्व महसूस होता है। राजनीतिक घटनाओं के अध्ययन के बिना उसके बारे में राय प्रकट करने में उन्हें कोई हिचकिचाहट नहीं होती। क्योंकि, गं्रथों से अधिक वे अपने अंदर की आवाज की सुनते रहते हैं। मुझे इस प्रकार की सीख नहीं मिली है। मुझे अंदर की आवाज का अनुभव नहीं है। इसलिए मैंने रानडे, तिलक, गोखले की परंपरा के अनुसरण से चलने वाले श ब काले स्मृति दिवस पर आयोजित इस सभा में अपने विचार आपके सामने पेश किए हैं। इसमें जो हिस्सा आपको ठीक लगे उसे आप स्वीकारें। आपसे मेरी यह प्रार्थना है। इतना कह कर मैं अपना भाषण परू करता हूं। (तालियों की गूंज)
श्री ना. मा. जोशी ने डॉ. अम्बेडकर को धन्यवाद देते हुए कहा, ‘‘डॉ. अम्बेडकर एलफिन्स्टन कालेज में मेरे शिष्य थे। मुझे इस बात का बड़ा गर्व है। स्वतंत्र बुद्धि के साथ विचार करते हुए साहस के साथ अपनी राय को सबके सामने रखने वाले उनके जैसे मार्गदर्शकों की आज के युवाओं को जरूरत है। कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए मुंबई से यहां आने का कष्ट उन्होंने उठाया। इसके लिए संस्था की ओर से मैं उनके प्रति हृदय से आभार प्रकट करता हूं।’’ फूलमाला अर्पण करने के बाद कार्यक्रम समाप्त हुआ।