226 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
रहा है और यह नीति कितनी हास्यास्पद है इसका प्रत्यक्ष यकीन कराने के लिए डॉ. अम्बेडकर ने ग्रेट ब्रिटेन, आयर्लैंड, कनाडा, नार्वे आदि देशों की जनसंख्या और वहां के देशी शराब से होने वाली आमदनी के आंकड़े देकर मुंबई इलाके में शराब पर पाबंदी लगाने का मसला आपातिक नहीं है यह साबित कर दिखाया। उन्होंने कहा कि, इसी प्रकार अपने प्रांत में विदेशी शराब की खपत का अनुपात देखो तो प्रति व्यक्ति तीन ड्रम होगा और पूरे इलाके में शराब पीने वालों को गिनें तो करीब 10 लाख लोग शराब पीते हैं इसका पता चलेगा। हमारे देश की महिलाएं शराब नहीं पीतीं। इतना ही नहीं मंजे हुए पियक्कड़ को भी अपनी पत्नी का शराब पीना रास नहीं आएगा।
अमेरिका में शराब पर पाबंदी लगाए जाने का उदाहरण देकर हमारी सरकार यहां का मसला हल करना चाहती है। लेकिन वहां शराब पर पाबंदी लगाए जाने से पूर्व का हाल क्या हमारी सरकार ने देखा है? उस दौरान अमेरिका में शराब की खपत इतनी बढ़ी थी कि शराब बेशुमार पीने के कारण कई लोगों की मौत हो चुकी थी। लेकिन क्या वैसे भयानक हालात हमारे प्रांत में दिखाई देते हैं? तो फिर सरकार को शराब पर पाबंदी लगाने का मसला इतना गंभीर क्यों लगता है? इससे महत्वपूर्ण है शिक्षा का मसला। आज सबसे पहले इसी मसले पर ध्यान दिया जाना चाहिए। हमारे इलाके में साक्षरता का अनुपात कितना कम है यह आगे दिए जा रहे आंकड़ों से पता चलेगा। यहां पुरुषों में 12.3 प्रतिशत और महिलाओं में केवल 2.4 प्रतिशत इतना कम है। साफ-साफ बताना हो तो 86 प्रतिशत पुरुष और 98 प्रतिशत महिलाएं हमारे देश में निरक्षर, अनपढ़ हैं। काँग्रेस सरकार ने प्रौढ़ महिला और पुरुषों की शिक्षा के बारे में सोचने के लिए एक कमेटी का गठन किया था। उस कमेटी ने इस संदर्भ में अपनी रिपोर्ट भी पेश की है। लेकिन इस बजट में उसका कोई प्रबंध नहीं किया गया है। काँग्रेस सरकार अगर शराब पर पाबंदी लगाने के लिए 169 लाख रुपए झोंकने के बजाय शिक्षा पर इस रकम का उपयोग करे तो यह बहुत बड़ा काम होगा। प्राथमिक, माध्यमिक और कॉलेज में पढ़ने वाले छात्रों के आंकड़े देकर उन्होंने बताया कि किस प्रकार शिक्षा का सवाल हल करना महत्वपूर्ण और आपातिक है। उन्होंने कहा कि इस प्रांत के शहरों में 184 प्राथमिक विद्यालय हैं। विभिन्न गांवों में केवल 8599 विद्यालय हैं और 12885 गांवों में स्कूल ही नहीं हैं। इलाके में अगर प्राथमिक शिक्षा को अगर मुफत कर दिया जाए तो 1 करोड़ 30 लाख रुपयों का
खर्चा आएगा। शराब पर पाबंदी लगाने के लिए खर्च की जाने वाली रकम इस काम के लिए काफी है। फिर सरकार शराब प्रतिबंधित कराने के बजाय इस रकम को शिक्षा पर क्यों नहीं व्यय करती? इस सरकार को क्या शिक्षा की योजना पर खर्च करना ठीक नहीं लगता? यहां मैं सांसद फडणीस से इस बारे में सीधे सवाल पूछना चाहता हूं। शिक्षा की ही तरह सार्वजनिक स्वास्थ्य का मसला भी महत्वपूर्ण है। आज सरकार सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा पर जो रकम खर्च करती है वह इतनी कम और अपर्याप्त है कि गांवों