231
156
* सभी राजनीतिक दल एक होकर हिंदी राजनीति की धुरा सम्हालें
रविवार दिनांक 2 अप्रैल, 1939 को विलेपार्ले, मुंबई के लोकशाही स्वराज पक्ष की ओर से मुंबई म्युनिसिपल कारपोरेशन में चुनाव जीतने वाले कुछ हिंदू कार्पोरेटर्स को सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया गया। इस कार्यक्रम में श्री रामभाऊ तटणीस, अॅड तलपदे, पि. दोंदे, श्री भगवंतराव परलकर और डी. वी. प्रधान आदि सदस्य उपस्थित थे। इस कार्यक्रम में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को खासतौर से आमंत्रित किया गया था। शुरूआत में अभिनंदन का जवाब देते हुए कुछ लोगों के भाषण हुए। उसके बाद डॉ. अम्बेडकर से बोलने की विनती की गई। उन्होंने अपने भाषण में गांधी युग से पूर्व के हिंदी राजनीतिक स्थितियों का विश्लेषण करते हुए कहा कि-
गांधी युग की शुरूआत होने से पूर्व भारत में नरमपंथी और चरमपंथी ये दो पक्ष ही प्रमुख थे। नरम पक्ष बुद्धि और अध्ययनपरक बुद्धि पर अधिक बल देता था। तो, चरम दल इस बात को अधिक महत्व देता था कि देश के लिए अलौकिक स्वार्थ त्याग करना पड़े तो प्राणों की भी प्रवाह नहीं करनी चाहिए। लेकिन, गांधी युग से यह परिदृश्य पूरी तरह से बदल गया। राजनीति में ढोंगी लोगों का प्रवेश हुआ। दो आने की गांधी टोपी सिर पर लगाकर गांधी का दास होना जाहिर किया और बस हो गया देशभक्त। इससे हिंदी राजनीति में स्वार्थसाधकों का बोलबाला हुआ। आज गांधी जी जिस शुद्धी की बात कर रहे हैं उसके लिए खुद ही जिम्मेदार हैं। जिस गंदगी की इस प्रकार गंदगी से ही पैदाइश हुई उनका आपस में मिलना तय था।
काँग्रेस के असहकारिता आंदोलन के कारण हजारों लोग कारागार चले गए। उस कारावास की महति वे मुक्त कंठ से गाते हैं। लेकिन इन कारावासों के दौरान स्त्री-भोगादी सुख लेने के उदाहरण उजागर होने के कारण यह कैसे कहा जा सकता है कि कारावास सश्रम था असल कलेश, दुख तो लो? तिलक ने भोगे। उनके कारावास की काँग्रेसी नेताओं के कारावास के साथ तुलना करना असंभव है। कारावास के उनके अनुभवों को देख कर आंखों से आंसुओं की
खून की बूंदे भी रिस सकती है। काँग्रेस की सत्ता यानी तानाशाही और इसके लिए चुनावक्षेत्र ही जिम्मेदार हैं। सो अब उसकी ओर से काँग्रेस की राजनीतिक असफलता को कोसना बेकार है। इसका केवल एक ही उपाय है कि सभी राजनीतिक पार्टियां एक होकर काँग्रेस के ढोंग को उजागर करें। सभी राजनीतिक पक्षों को एक होकर संगठन बनाकर बेझिझक हिंदी राजनीति की जिम्मेदारी अपने हाथ में लेने की कोशिश करनी चाहिए। आप मुंबई एसेंब्ली के आज के दृश्य को देखें, एसेंब्ली के काँग्रेस सदस्यों पर नजर डालें- आपको लगेगा कहीं यह किंग एडवर्ड अस्पताल का लूलो-लंगड़ों, अंधों-बूढ़ों का वार्ड तो नहीं है?
जनताः 8 अप्रैल, 1939